मन भी बदलना जरूरी

  इलमा अज़ीम 
जीवन में बड़े बदलाव लाने के लिए न तो नये दिन की जरूरत होती है और ना ही नये साल की। बल्कि जरूरत होती है अटूट संकल्प की। जब हम संकल्प के किंतु-परंतुओं से हटकर एकाग्र होते हैं तो संकल्प फलीभूत होते हैं। जरूरत इस बात की होती है कि हम दृढ़निश्चयी बनें। यह भी जरूरी नहीं है कि बदलाव नये साल की शुरुआत में ही कुछ ही दिनों में हासिल हो जाएगा। 
लक्ष्य पाने की प्रक्रिया को अनवरत धीरे-धीरे अपने शरीर व मन को उसके अनुरूप ढालकर भी पूरा किया जा सकता है। आज हम बीत रहे साल के उस पड़ाव पर खड़े हैं, जहां एक तरफ़ बीते साल की खट्टी-मीठी यादें हैं तो दूसरी तरफ़ नये साल को लेकर की गई तमाम नई उम्मीदें हैं। मात्र एक दिन में ही कैलेंडर की तारीख़ बदल जाएगी और साथ ही डायरी के पन्ने भी। 
लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल उठता है कि क्या हम भी बदल पाएंगे। क्या समस्याओं के समाधान के लिए हमारे पुराने वही घिसेपिटे दृष्टिकोण रहेंगे, जिनसे हम अपने जीवन को बेहतर न बना पाए। हर साल 31 दिसंबर की रात, हम उत्साह के आवेश में स्वयं से कई वादे कर डालते हैं जैसे रोज़ सुबह योग करेंगे, गुस्सा नहीं करेंगे, सोशल मीडिया से दूरी बनाएगे आदि-आदि। 


लेकिन शोध बताते हैं कि नए साल पर अधिकांश लोगों द्वारा लिए गए संकल्प जनवरी के दूसरे शुक्रवार आने तक टूट जाते हैं। यही कारण है कि जनवरी माह के इस दूसरे शुक्रवार को ‘क्विटर्स डे’ यानी हार मान लेने वालों का दिन भी कहा जाता है। आखिर ऐसा क्यों होता है कि जिस परिवर्तन का संकल्प हम इतने उत्साह से लेते हैं, वह दस दिन भी नहीं टिक पाता? 


दरअसल, संकल्प इसलिए टूटते हैं, क्योंकि हमारे पास विकल्प होते हैं। अगर संकल्प में कोई विकल्प न हो, तो कामों का सिद्ध होना तय है। इसलिए संकल्प में पीछे हटने का रास्ता बंद कर दिया जाना चाहिए।  तो इस बार, जब हम 31 दिसंबर की रात घड़ी की सुइयों को मिलते हुए देखें तो नए वर्ष का स्वागत जश्न मनाने, आतिशबाजी करने और ‘हैप्पी न्यू ईयर’ कहने जैसी औपचारिकताएं अवश्य करें, पर अपने भीतर के सारथी को भी जगाएं।

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