आज भी प्रासंगिक हैं संत रविदास के विचार
- शिवचरण चौहान
जिस समय रैदास का जन्म हुआ उस समय समाज में ऊंच-नीच विषमता ढोंग आडंबर व्याप्त थे। रैदास का जन्म सन 1433 रविवार के दिन हुआ था। वह दिन माघ पूर्णिमा का दिन था और चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं के साथ निकला था। बालक रैदास का जन्म इसी दिन हुआ था और विशेष कार्य के लिए हुआ था।
कबीर के संपर्क में आने के बाद रैदास ,संत रविदास बन गए और सदगुरु कबीर के कहने पर उस समय के महान संत विचारक निर्गुण उपासक रामानंद से दीक्षा ली। और हिंदू धर्म के प्रचार प्रसार में तन मन धन उजावर कर दिया। रविदास के 41 पद गुरु ग्रंथ साहब में संग्रहित है। सिख गुरु रविदास का बहुत सम्मान और आदर करते थे।
यह वह समय था जब हिंदू धर्म पर इस्लाम का खतरा था और विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा भारत में बहुत अत्याचार किए जा रहे थे।
ऐसे समय में दक्षिण भारत से आकर रामानंद ने प्रयागराज होते हुए काशी को अपना कर्म क्षेत्र बनाया। विट्ठल दास ने मथुरा को। रामानंद और विट्ठलदास ने अपनी भक्ति की शक्ति से डूबते हुए हिंदू धर्म को बचा लिया।
कबीर ने सद्गुरु रामानंद को पहचाना और उनसे राम नाम की दीक्षा ली। रामानंद के राम , निर्गुण राम थे। वह अयोध्यापति अथवा दशरथ के बेटे नहीं हैं।
कहते हैं रविवार माघ पूर्णिमा को जिस दिन बालक रैदास का जन्म हुआ था वह दिन बहुत शुभ दिन था। रामानंद से दीक्षा लेने के बाद रैदास रविदास हो गए। अद्भुत ज्ञान और दैवीय शक्ति रविदास में आ गई।
भक्त कवि, दार्शनिक और समाज सुधारक के रूप में रविदास ने उत्तर भारत को बहुत प्रभावित किया। उनके मत को मानने वाले दक्षिण भारत में भी लाखों भक्त हैं। रविदास की पहचान एक सतगुरु के रूप में उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक फैल गई। मीराबाई ने उन्हें अपना अध्यात्मिक गुरू माना है। बंगाल बिहार उत्तर भारत मध्य प्रदेश हरियाणा पंजाब और राजस्थान दिल्ली में उनके हजारों हजार अनुयाई बन गए थे। और आज भी है।
रविदास ने एक निम्न जाति के घर जन्म लिया था। रविदास के पिता जूता बनाने और जूता मरम्मत का काम करते थे। संत रविदास में अपने पिता का काम पैतृक रूप में अपनाया। भक्तों का घर में डेरा लगने के कारण पिता ने उन्हें अपने घर से निकाल दिया था। रविदास में भिक्षा नहीं मांगी। अपने पैतृक कर्म से अपना जीविकोपार्जन किया और साधु-संतों को भी अपने कमाई के धन से ही खिलाया पिलाया सत्संग किया।
संत रविदास का जब जन्म हुआ उस समय काशी में जात पात ऊंच-नीच छुआछूत आडंबर ढोंग का बोलबाला था। रविदास ने अपनों से दोहों से समाज में जागृत फैला दी। काशी के महाराज भी उनका आदर करते थे। कहते हैं बाबर अपने बेटे हूंमायू के साथ काशी आया था और रविदास के दर्शन कर आशीर्वाद मांगा था। रविदास के कहने पर बाबर ने हिंदुओं पर अत्याचार कम कर दिए थे। रविदास अपनी संत मंडली , सत्संग मंडली के साथ निरंतर यात्राएं करते रहते थे और अपने कविता दोहों ,पदों से जन जागरण किया करते थे। उनकी भाषा इतनी मधुर और प्रभाव कारी थी कि जहां भी जाते लोग उनके शिष्य बन जाते थे। संपूर्ण उत्तर भारत में संत रविदास ने जात पात ऊंच-नीच का विरोध किया और समाज में समरसता कायम की। राजा महाराजा भी उनके ज्ञान और भक्ति का सम्मान करते थे।
उनकी मृत्यु के बारे में विवाद है कुछ लोगों का कहना है कि संत रविदास ने लंबी उम्र पाई थी और वह करीब 120 वर्ष तक जिंदा रहे । कुछ विद्वान उनकी मृत्यु सन 1540 में बताते हैं। रविदास को मारने के लिए तमाम षड्यंत्र सवर्णों और ढोंगी पंडित पुजारियों द्वारा किए गए थे। किंतु रविदास को सचमुच में ईश्वर की कृपा प्राप्त थी। कहते हैं उन्हें बहुत चीजों का पूर्वानुमान हो जाता था। मन चंगा तो कठौती में गंगा उनका एक अद्भुत प्रसंग है जो आज तक कहां सुना जाता है। काशी में मां गंगा को अपनी कटौती में बुलाने वाले रविदास के नाम पर अब भदोही जिले का नाम बदलकर संत रविदास नगर कर दिया गया है। काशी में गंगा तट पर रविदास घाट, संत रविदास पार्क और संत रविदास द्वार बनाए गए हैं। रविदास के नाम पर मेले लगते हैं।
संत रविदास के पद पढ़ने पर महसूस होता है कि वह निर्गुण भक्ति धारा के अद्भुत कवि थे।संत रविदास ने ईश्वर में परम श्रद्धा का आग्रह करते हुए एक 'साखी' में कहा है कि हरि जैसे हीरे को छोड़कर जो अन्य की आशा करते हैं, वे व्यक्ति यमलोक जाएँगे
'हरि हीरा छाडि कै,
करै और की आसा ।
आन जमपुर जाहिंगे, , ऐसा कह त रैदासा।।
संत रैदास ने आग्रह किया है कि सभी प्रतिवाद छोड़कर रात दिन हरि का स्मरण करें 'रैदास राति न सोइये,
दिवस न करिये स्वाद।
अह-निसि हरिजी सुमिरिये,
छाडि सकल प्रतिवाद ।।
ईश्वर में संत रैदास की परम आस्था थी। उन्होंने अनेक स्थानों पर ईश्वर के नाम सगुणात्मक रखे हैं किन्तु उनका निर्देश निर्गुण ब्रह्म से है -
'ऐसी भगति न होइ रे भाई।
राम नाम बिन जो कछु करिये,
सो सब भरम कहाई।'
संत रैदास जी का विचार है कि ईश्वर की उपासना में जाति का कोई महत्त्व नहीं है, ईश्वर की भक्ति पर उनकी बड़ी आस्था है। एक पद की कुछ
पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं
'रे चित चेत अचेत काहे,
बालक को देख रे।
जाति ते कोई पद नहिं पहुँचा,
रामभगति बिसेख रे।।
संत रैदास ने एक पद में ईश्वर के बारे में
कहा है कि मैंने बहुत से वेश धारण किए किन्तु ईश्वर के भेद को मैं नहीं जान सका। मन काम में जन्म गँवा दिया। साधु संगति में मिलकर नाम का गायन नहीं किया। तिलक दिए , बहुत सी मालाएँ भी पहनी । फिर भी ईश्वर को नहीं पा सका।
संत रैदास कहते हैं_
'भेष लियो पै भेद न जान्यो।
अमृत लेइ विशै सो मान्यो।।टेक!!
काम क्रोध में जनम गँवायो।
साधु सँगति मिलि राम न गायो।
तिलक दियो पै तपनि न जाई
माला घनेरी लाई।
कह रैदास मरम जो पा लूं
देव निरंजन सत कर ध्याऊ ।।'
संत रैदास ने एक स्थान पर कहा है कि हे मन,पहिले संभलकर तू राम का नाम ले। माया के भ्रम में कहीं तू भूल में पड़ा है, अंत में सभी हाथ झाड़कर वहीं जाओगे-
'कहु मन राम नाम संभारि।
माया के भ्रम कहाँ भूल्यो,
जाहुगे कर झारि
भक्त रैदास ने एक पद में कहा है कि ईश्वर के प्रेम और विरह के दु:ख का अनुभव वही कर सकता है जिसे इस दर्द का अनुभव हुआ है। कुछ पक्तियाँ
द्रष्टव्य हैं -
'सो कहा जानै पीर पराई
जाके दिल में दरद न आई।
प्रभु दर्शन की कामना करते हुए संत रैदास ने कहा है कि हे राम! आप दर्शन दीजिए। दर्शन में बिलम्ब न कीजिए। आपके दर्शन ही मेरा जीवन है। जैसे चन्द्र के दर्शन किए बिना चकोर को चैन नहीं मिलता।
'दरसन दीजे राम दरसन दीजै।
दरसन दीजै बिलंब न कीजै ।टेक।।
बिन दरसन क्यों जिवै चकोरा
धन जोबन की झूठी आसा।
मिलकर जन्म-जन्म के उसके दु:ख दूर करता है-
।।आँगन बँगला भवन भयो पावना जीवन मोरा। जग चेला।
अब के बिछुरे मिलन दुहेला।2।।
सत सत भाषै जन रैदासा।।3।'
संत रैदास द्वारा रचित एक पद बड़ा मार्मिक है उसमें उन्होंने आत्मा रूपी स्त्री का परमात्मा रूपी पुरुष से मिलाप का प्रतीकात्मक रूप में वर्णन किया
है। आत्मा रूपी स्त्री कहती है कि आज मैं बलिहारी जाती हूँ। आज मेरे घर प्यारे राम आए हैं। उनके आने पर
मेरा आंगन, बंगला, भवन सब पावन हो गया है। द्वीप द्वीप के भक्त हरि का यशोगान कर रहे हैं। मैं उन्हें
दण्ड वत प्रणाम करती हूँ तथा उनके चरण धोती हूँ। तन, मन, धन उनपर न्योछावर करती हूँ।
उपमा तथा रूपक अलंकारों का सुन्दर प्रयोग संत रैदास द्वारा रचित वाणियों में अनेक स्थानों पर किया गया है। संत रैदास द्वारा विरचित एक पद
अत्यन्त मार्मिक है जिसमें उन्होंने ईश्वर से विभिन्न प्रकार से घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित किया है। संत रैदास
दास्य भाव में भक्ति करते हुए कहते हैं कि ईश्वर के नाम की रट लग गई है वह अब कैसे छूटे। प्रभु जी
तुम चंदन हो हम पानी हैं जिसकी अंग-अंग में वाससमाहित है। प्रभु जी तुम घने जंगल हो और हम मोर हैं। चाँद को देखने वाले चकोर की भाँति हम तुम्हें देखते हैं। प्रभुजी तुम दीपक हो और हम बाती हैं। जिसकी ज्योति दिन रात जल रही है।
तुम मोती हम धागा हैं। प्रभु जी तुम स्वामि हम दास हैं। रैदास ऐसी भक्ति करते हैं- प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग अंग बास समानी।
संत रैदास की वाणियों में लोक कल्याण पर अत्यन्त बल दिया गया है। उन्होंने कहा है कि जिससे सब सुख पाएँ वह हरि जी का दास है अर्थात् हरि का सच्चा सेवक है। जिस से कोई दु:ख पाए वह दास हरि का दास नहीं है अर्थात् सच्चा सेवक नहीं है-
'सब सुख पावै जासुतें, सो हरि जू के दास।
कोउ दुःख पावै जासुतें सो न दास हरिदास।।'
संतों के मन में सबके कल्याण की बात होती है। वे घट-घट में ईश्वर को देखते हैं तथा जाति-पाँति नहीं पूछते-
'संतन के मन होत है, सब के हित की बात।
घट-घट देखें अलख को, पूछे जात न पात।।'
भेदभाव का विरोध करते हुए संत रैदास ने कहा है कि सारा प्रसार एक ही ब्रह्म का हो रहा है। सब घट
एक ही माटी से सृजित हैं तथा सबका सृजन करने रचने वाला एक ही है-
'रविदास एकै ब्रह्म का होइ रहयो सगल पसार।
एकै माटी सब घट मजै एकै समकू सरजन हार।।'
मनुष्य को बुरे कार्यों से बचना चाहिए इस सम्बंध में संत रैदास का कथन है _
'रविदास जन्म के कारने होत न कोई नीच।
नर कू नीच कर डारी है ओछे कर्म की कीच ।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं
'महात्मा रविदास बड़े ही मधुर स्वभाव के भक्त थे। उन्होंने किसी पर कठोर आक्षेप या व्यंग्य नहीं किया।
इस अर्थ में वे सच्चे वैष्णव थे- अहिंसक, निरभिमानव और मानदाता।'
संत रैदास द्वारा रचित एक दोहा अत्यंत मार्मिक है जिसमें उन्होंने कहा है कि मनुष्य जन्म पाकर उसे सोने और खाने तक सीमित रख कर व्यर्थ न जाने दे।
रैन गवाई सोइ करि, दिवस गवायो खाय। हीरा यह तन पाइ करि, कौड़ी बदले जाय।।
महात्मा रैदास जी की बानी, पृष्ठ 340 गोस्वामी श्रीनाभादास जी कृत भक्तमाल में संत रैदास के सम्बंध में एक छप्पय में कहा गया है कि उन्होंने सदाचार पर आधारित जो वचन कहे वह वेदशास्त्र के विरुद्ध न थे, ज्ञानी जनों ने भी उन्हें स्वीकार किया, भगवत् कृपा से उन्होंने इस शरीर के रहते हुए ही परमगति प्राप्त कर ली थी, राजसिंहासन पर बैठे लोग भी उनका सम्मान करते थे, लोग
वर्णाश्रम का अभिमान त्याग कर उनके चरणों को धूलि की वंदना करते थे, संत रैदास की विमल वाणी संदेह को दूर करने में बड़ी सहायक है-
'सदाचार श्रुति शास्त्र बचन अबिरुद्ध उचारयो।
नीर खीर बिबरने परम हंसनि उर धारयो।।
भगवत् कृया प्रसाद परमगति इत तन पाई।
राजसिंहासन बैठि ज्ञाति परतीति दिखाई।
वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज बंदहि जासु की।
संदेह ग्रंथि खंडन निपुन, बानि बिमल "रैदास" की।।'
संत रैदास मूलतः भक्त थे इसीलिए उनकी रचनाओं में कलापक्ष की अपेक्षा प्रतिपाद्य पर अधिक ध्यान दिया गया है। अपने विचारों और भावों की अभिव्यक्ति हेतु उन्होंने ब्रजभाषा को विशेष रूप से अपनाया है। उनके द्वारा प्रयोग की गई ब्रजभाषा सरल
और स्वाभाविक है जिसमें विभिन्न स्थानों पर अरबी, फारसी, अवधी, पंजाबी, राजस्थानी इत्यादि भाषाओं
के शब्दों का सुन्दर प्रयोग किया गया है। भक्त कवयित्री मीराबाई ने संत रैदास को गुरू के रूप में स्मरण करते हुए कहा- 'गुरु रैदास मिले मोहि पूरे, धुर से कलम भिड़ी। सत गुरु सैन दई जबआके, जोई लड़ी। ।
आज भी बहुत से लोग उनके प्रति अत्यंत श्रद्धाभाव रखते हैं।
रैदास एक बड़े भक्त थे जिनका नाम हिन्दुस्तान ही नहीं वरन दूसरे देशों में भी प्रसिद्ध है।- गुजरात में इस मत के लाखों अनुयायी हैं जो अपने को रविदासी कहते हैं।'
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी मानते है कि रविदास की प्रेरणामयी वाणियों ने
सामाजिक दृष्टि से उपेक्षित, आर्थिक दृष्टि से वंचित और राजनीतिक दृष्टि से तिरस्कृत हजारों हजार अकारण
दण्डित मनुष्यों में सिर ऊँचा करके चलने की शक्ति दी है और मनुष्य जीवन के उत्तम लक्ष्य तक पहुँचने की प्रेरणा दी है। इसलिए यह कहना बिलकुल सही है कि ये वाणियाँ मनुष्यता की अमूल्य निधि हैं।
इनके चिन्तन और मनन से पीढ़ियों तक प्रेरणा मिली है और मिलती रहेगी।
(हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली
6 पृष्ठ-345-346)
संत रैदास द्वारा रचित वाणियों में भावात्मक एकता तथा प्रेम को बड़ा महत्व दिया गया है। उन्होंने गुरु की महिमा का वर्णन किया तथा अनेक सामाजिक कुरीतियों और बुराइयों को दूर करने पर बल दियामानव प्रेम और सद्भावना पर संत रैदास ने बहुत बल दिया है। भारत की भावनात्मक एकता, भक्ति भावना, प्रेम, सद्भावना एवं मानवता इत्यादि
भावना को सुदृढ़ बनाने में संत रैदास की रचनाएं वाणीआज भी प्रासंगिक है।
(लेखक प्रतिष्ठित साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार हैं)



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