अपराध का राजनीतिकरण
 इलमा अजीम 
राजनीतिक संरक्षण में अपराधियों का फलना-फूलना किसी भी समाज के लिये दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। संगीन अपराध के मुद्दे पर राजनीति करने के बजाय वास्तविक अपराधियों को दंडित करना ही प्राथमिकता होनी चाहिए। पश्चिम बंगाल की राजनीति में आपराधिक तत्वों का बोलबाला दशकों से जारी रहा है। कभी जो दबंग लोग पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार के दौरान वोट छापने व बूथ कब्जाने के लिये कुख्यात थे, अब उनके ही चोला बदलकर सत्तारूढ़ टीएमसी के कार्यकर्ताओं के रूप में नजर आने के आरोप लग रहे हैं। स्थानीय निकाय चुनावों में हुई हिंसा व चुनावों में हेराफेरी इसकी बानगी बतायी जाती है। ताजा मामला पश्चिम बंगाल के उत्तर परगना जिले में स्थित संदेशखाली का है, जो आज राजनीति का अखाड़ा बना हुआ है। दरअसल, एक अनाज घोटाले में ईडी की कार्रवाई पर टीएमसी कार्यकर्ताओं के प्रतिरोध और उसके बाद ईडी अधिकारियों पर हमले के बाद संदेशखाली में नये-नये खुलासे होते रहे हैं। हिंसा व दबंगई के लिये कुख्यात इलाके में दबंग राजनेताओं द्वारा जमीन कब्जाने और आदिवासी महिलाओं के शोषण के मामले उजागर हुए। हालांकि, सत्ता पक्ष और विपक्ष की तरफ से आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला जारी है और अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण के आरोप लगाये जा रहे हैं। भाजपा की ओर से जहां महिला मुख्यमंत्री वाले राज्य में महिलाओं का शोषण करने वाले टीएमसी नेताओं को बचाने के आरोप लगाए जा रहे हैं, वहीं सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की ओर से विपक्ष पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के आरोप लगाये जा रहे हैं। निस्संदेह, इस विवाद के राजनीतिक निहितार्थ भी हैं, लेकिन यदि दबंग राजनेताओं द्वारा महिलाओं का सामूहिक शोषण किया जाता है तो निश्चय ही यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। आरोप है कि भाजपा आम चुनाव के मद्देनजर ध्रुवीकरण के प्रयासों में लगी है।  बहरहाल, राशन घोटाले, अभियुक्तों के ठिकानों पर छापे, जमीन हड़पने और सामूहिक उत्पीड़न के आरोपों के बीच संदेशखाली लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। बहरहाल, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों से इतर यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि आज भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में दबंगों का वर्चस्व बना हुआ है।

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