हिंसा और गांधी दर्शन

रूस-यूक्रेन युद्ध आठवें महीने में प्रवेश कर गया है। यूक्रेन के चार प्रांतों को रूस ने अपनी तरफ से जनमत संग्रह करवा कर औपचारिक रूप से रूसी फेडरेशन का अंग बना लिया है। वहीं यूक्रेन ने नाटो की सदस्यता की कोशिशें तेज कर दी हैं। साथ ही सहयोगी देशों से ज्यादा से ज्यादा हथियार देने और रूस पर ज्यादा से ज्यादा प्रतिबंध लगाने की मांग भी। आशंका जताई जा रही है कि यह युद्ध देर-सवेर रूस और पश्चिमी देशों के बीच का युद्ध बन सकता है। वर्तमान दौर की विश्व-व्यवस्था का नियमन-संचालन संयुक्त राष्ट्र संघ एवं उसकी विभिन्न इकाइयों, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन, विश्व आर्थिक मंच और आर्थिक-सामरिक-भूराजनीतिक हितों के मद्देनजर बनने वाले चुनिंदा देशों के साझा मंचों-संगठनों, दूतावासों आदि के जरिये होता है। उक्त वैश्विक संस्थाओं के तहत काम करने वाली यह विश्व-व्यवस्था अलग-अलग देशों और अंतर्राष्ट्रीय धरातल पर राजनीतिक-तंत्र, कूटनीतिक-तंत्र, सैन्य-तंत्र, अर्थ-तंत्र, बौद्धिक-तंत्र और धर्म-तंत्र की छह परस्पर गुंथी परतों का समुच्चय होती है। पिछले चार दशकों से जारी युद्धों समेत तरह-तरह के हिंसक टकराव नवउपनिवेशवादी प्रक्रिया का हिस्सा कहे जा सकते हैं। इस व्यवस्था में निर्णायक बदलाव आसान नहीं है। इसकी मजबूत किलेबंदी तो है ही, इसका विरोध करने वाले लोगों की तरफ से किए जाने वाले प्रयासों में जरूरी गंभीरता और प्रतिबद्धता नहीं होती। क्योंकि आधुनिक सभ्यता और उसे चलाने वाली व्यवस्था के विरोधियों के मन में हमेशा आधुनिक सभ्यता के पथ पर पिछड़ जाने का डर बैठा रहता है। पूंजीवादी विकास की अवधारणा ने विकसित ही नहीं, विकासशील और अविकसित देशों की जनता के दिमाग में भी गहरी जड़ जमाई हुई है। ज्ञान-विज्ञान की अभी तक घटित हो चुकी भूमिका पर गम्भीरतापूर्वक विचार करके ही उनकी कोई अलग भूमिका तलाशी जा सकती है। यह विश्व-व्यवस्था रोतों-रात नहीं बदली जा सकती। एक सुविचारित दीर्घावधि योजना के तहत ही इसमें बदलाव लाने की संभावना बन सकती है। अगर ऐसी कोई सच्ची पहल होती है, तो मोहनदास करमचंद गांधी उस प्रयास में सहायक हो सकते हैं। यह सही है कि भविष्य में लंबे समय तक हिंसा पर टिकी भोगवादी दृष्टि आधुनिक सभ्यता के केंद्र में बनी रहेगी। लिहाजा, गांधी के मानव-सभ्यता और आधुनिक सभ्यता के फलसफे को फिलहाल एक तरफ रखा जा सकता है। केवल उनके तरीके को अपनाते चलें, तो आधुनिक सभ्यता को हिंसा की धुरी से उतार कर अहिंसा की धुरी पर रखने की दिशा में कुछ कदम चला जा सकता है। गांधी ने एक पराभूत और भयभीत समाज को साहस और दृष्टि प्रदान करके विश्व की सर्वाधिक शक्तिशाली उपनिवेशवादी सत्ता को निर्णायक चुनौती दे डाली थी। उनके प्रयोग का असर पूरे एशिया और अफ्रीका के महाद्वीपों पर भी पड़ा था। गांधी ने भारत समेत विश्व को अन्याय के प्रतिकार की एक अभूतपूर्व कार्य-प्रणाली से समृद्ध किया। सभी जानते हैं कि गांधी आधुनिक हिंसक सभ्यता के चक्रव्यूह में गहरे घुस गए थे। लंबे समय तक अहिंसा की ताकत के साथ उन्होंने अपना संघर्ष भी बनाए रखा। लेकिन वे उस चक्रव्यूह से जिंदा वापस नहीं लौट सके। हालांकि उनका दिखाया रास्ता दुनिया के मंच पर बना रहा है। गांधी के बाद दुनिया की अनेक संघर्षशील विभूतियों ने अन्याय और अत्याचार का प्रतिरोध करने के लिए गांधी के रास्ते को अपनाया। उनमें अफ्रीका के नेल्सन मंडेला, डेस्मंड टूटू, तंजानिया के जूलियस न्ययेरे, अमेरिका के मार्टिन लूथर किंग जूनियर, तिब्बत की स्वतंत्रता के अहिंसक आंदोलनकारी, ईरोम शर्मीला आदि के नाम प्रमुखता से आते हैं। भारत में डॉ. भीमराव अंबेडकर, आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण, डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे कई विचारक और नेता रहे हैं जिन्होंने गांधी के अहिंसक संघर्ष की विरासत को समृद्ध किया है।

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