परंपराएं गाँव-गिराँव की
- डा.जगदीश सिंह दीक्षित
पूज्य महात्मा गाँधी जी कहते थे कि जिस दिन हिन्दुस्तान के गाँव समाप्त हो जायेंगे उस दिन हिन्दुस्तान ही समाप्त हो जाएगा। इसके पीछे उनकी सोच थी कि असली हिन्दुस्तान गांवों में बसता है। भारतीय संस्कृति, सभ्यता, रीति-रिवाज, परम्पराएं, प्रथाएं, सामाजिक मूल्य और मानदंड गांवों में ही रचती-बसती है। आज भी देखिये कि जितने भी धार्मिक अनुष्ठान हैं उनको गाँव का हर तबका बड़े ही जोरशोर से मनाता है। पंचक्रोशी परिक्रमा हो या फिर कांवड यात्रा! कौन कर रहा है? आज भी होली, दीपावली, नागपंचमी जैसे त्योहार हिन्दुस्तान के ग्रामवासी बड़े ही धूमधाम से मनाते हैं।
बचपन में मैं देखता था कि-जब छोरा या छोरी का विवाह तय हो जाता था तो उसके बाद गाँव के पण्डित जी को बुलाकर विशेषरूप से घर की मुखियाइन उनसे उर्दी छूने, माँड़ो गाड़ने, हर्दी लगाने जैसे अनुष्ठानों की साइत पूछती थीं। उर्दी छूने के दिन से ही रात में खाने-पीने के बाद पूरे गाँव की औरतें और छोरियां गीत-गवनही शुरु कर देती थीं। उसी में किसी न किसी दिन दारोगा-सिपाही बनकर सोये हुये पुरुषों को हड़काती थीं।
जब बारिश नहीं होती थी तब हर गाँव में छोरे दरवाजे-दरवाजे पानी गिराकर लौटते थे और चिल्ला-चिल्लाकर गाते थे कि-मेघा सारे पानी दे।औरतें अंधियारी रात में खेतों में नंगी होकर उनमेंं से दो औरतें बैल बनती थीं और एक हरवाया। फिर खेत में हल चलाती थीं। इन्द्रदेव जी प्रसन्न होकर या तो उसी दिन या फिर दो-तीन में खूब मूसलाधार बारिस करते थे। लगता था जयकारा।
इसी तरह जब भोजन बनता था तब निश्चित रूप से दाल-चावल-आटा में से कुछ चुटकी निकालकर अलग-अलग बर्तन में रख दिया जाता था।जब कोई गरीब-दुखिया मांगने वाला आता था तब उसे दे दिया जाता था। जाड़े में जब भयंकर ठंढ पड़ती थी तब दरवाजे के सामने नीम के पेड़ के नीचे अलाव (कौड़ा) जलाया जाता था। कौड़ा के किनारे पुआल बिछा दिया जाता था। उसी पर बैठकर सबलोग तापते थे। एक-दो जो गरीब-दुखिया रहते थे वे लोग अपना गमछा ओढ़कर सो जाते थे। अक्सर माई हमलोगों से कहती कि-देख रे कौड़वा के यहां कौनो सोवल त ना ह?ओकरा के भी ना खइले होखे त खाना होय त खियाय दा। यह कितनी बड़ी सोच थी कि कोई बिना खाए किसी के दरवाजे सो जाय।
अब एक ऐसी परम्परा कहें या फिर टोटका। जब किसी की संतान जीवित नहीं रहती थी तो वह आगे वाली संतान को किसी गरीब-दुखिया को कुछ लेकर बेच देती थीं। बच्चा दो-चार दिन उनके घर रहता फिर अपने माँ के पास आ जाता था। हमारी माई। दादी । की शुरु की दी-तीन संतानें जीवित नही रहीं तब जब बड़े पिताजी पैदा हुये तो उनको माई और बाबा ने झुनखुन बाबा जो जाति के धोबी थे उनको बेच दिया।
मैं देखता था कि जब तक धोबीन दादी जीवित रहीं बड़े पिताजी के लिये खिचड़ी अवश्य भेजती थीं। फिर दूसरे दिन माई उसमें कुछ और मिलाकर बड़े पिताजी के हाथों धोबीन दादी को खिचड़ी भिजवाती थीं। आज इसमें से अधिकांश परम्पराएं नहीं निभाई जा रही हैं।



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