संगीत शिक्षा एवं शोध के विविध आयाम" विषय पर एक राष्ट्रीय वेबीनार का आयोजन
मेरठ।कनोहर लाल स्नातकोत्तर महिला महा विद्यालय मेरठ के संगीत विभाग और सांस्कृतिक एवं साहित्यिक परिषद द्वारा सम्मिलित रूप से "संगीत शिक्षा एवं शोध के विविध आयाम" विषय पर एक राष्ट्रीय वेबीनार का आयोजन किया।
वेबीनार में उद्घाटन सत्र, प्रथम, द्वितीय तकनीकी सत्र एवं तृतीय शोध पत्र प्रस्तुति के रूप में आयोजित किया गया।
राष्ट्रीय वेबीनार में 620 प्रतिभागियों ने रजिस्ट्रेशन कराया एवं गूगल मीट पर 100 एवं यूट्यूब पर 347 प्रतिभागी जुड़े रहे। आज के इस वेबीनार में भारतवर्ष के विभिन्न प्रदेशों एवं नगरों के विभिन्न विश्वविद्यालयों से मुख्य अतिथि एवम अतिथि वक्ता एवं प्रतिभागी सम्मिलित हुए। शोधार्थियों ने तृतीय टेक्निकल सेशन में अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए।कार्यक्रम का शुभारंभ काशी हिंदू विश्वविद्यालय की प्रतिभागी एवं शोध छात्रा कुमारी सुरुचि द्वारा सरस्वती वंदना से किया गया।महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. अलका चौधरी जी ने समस्त अतिथि गण का स्वागत करते हुए अपने संबोधन में कहा संगीत हम सभी को आपस में जोड़ता है। संगीत विश्वव्यापी विषय है।
वेबीनार के मुख्य अतिथि प्रोफेसर (पंडित) साहित्य कुमार नाहर, वाइस चांसलर, राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला यूनिवर्सिटी ग्वालियर, एम.पी. थे।
जिन्होंने अपने वक्तव्य में गुरु शिष्य के संबंध के विषय में सारगर्भित रूप से बताते हुए कहा कि गुरु में वह दक्षता होनी चाहिए जो विद्यार्थी की क्षमता को समझ कर उसका भविष्य में विकास कर सके। साथ ही उन्होंने संगीत विषय के संदर्भ में कहा कि संगीत में मधुर्यता, भावों की संप्रेषणशीलता , राग की प्रकृति, तान, अलाप, लय व ताल आदि महत्वपूर्ण बिंदुओं पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि शैक्षिक अध्ययन अध्यापन क्रम में शोध सर्वोत्तम अवस्था होती है जिसके द्वारा हम किसी तथ्य को विश्लेषणात्मक दृष्टि से प्रस्तुत कर नए आयाम के साथ विकसित करते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी संगीत और कला पर काफी फोकस किया गया है। उन्होंने बताया कि संगीत में अभ्यास और रियाज को भी अध्ययन अध्यापन के साथ समायोजित करना चाहिए।
इनॉग्रल सेशन में की-नोट स्पीकर के रूप में प्रोफेसर पंकज माला शर्मा, एक्स डीन एंड चेयरपर्सन, म्यूजिक डिपार्टमेंट, पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ सम्मिलित हुई।कीनोट स्पीकर डॉ पंकज माला शर्मा जी ने अपने वक्तव्य के माध्यम से बताया कि जब हम प्रथम गुरु या प्रथम शिष्य कौन है इस प्रश्न का उत्तर खोजते हैं तो हम पाते हैं कि केवल वैदिक साहित्य ही इस प्रश्न के स्रोत के रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत है। संगीत विषय के संदर्भ में उन्होंने बताया कि संगीत मात्र मनोरंजन नहीं है यह विद्या है। इसका अभ्यास किया जाता है। नित्य प्रति का अभ्यास, हमेशा चिंतनशील रहना, संगीत की प्रमुख विशेषता है। साथ ही यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि जहां स्वर टूटेगा वहां संगीत शिक्षा में व्यवधान आएगा। संगीत के तरीके विभिन्न है लेकिन साधना एक जैसी ही होती है। शोध के संदर्भ में उन्होंने बताया कि शोध के विभिन्न रूप है -वेदों का संगीतिकरण करना भी शोध है, किसी भी ज्ञान को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करना शोध है, उदाहरण के लिए महर्षि वेदव्यास जी ने व्यवस्थित ढंग से श्लोकों को प्रस्तुत किया, वह भी शोध का ही एक प्रकार है। सारे उपनिषदों का सार, सारे ग्रंथों का सार शोध ग्रंथ है,ज्ञान ग्रंथ है। इनकी चर्चा, पठन-पाठन, अभ्यास होना जरूरी है। उन्होंने अपने वक्तव्य में गुरुमुखी शिक्षा का वर्णन करते हुए बताया की जो विद्या केवल पुस्तकों में है वह कभी उतनी फलदाई नहीं नहीं होती जितनी कि गुरु के मुख से प्राप्त शिक्षा होती है।
वेबीनार के प्रथम एवं द्वितीय टेक्निकल सेशन में मुख्य अतिथि के रुप में प्रो प्रवीण उद्धव, विभागाध्यक्ष, डिपार्टमेंट ऑफ इंस्ट्रुमेंटल फैकल्टी ऑफ म्यूजिक एंड परफॉर्मिंग आर्ट, बी.एच.यू. वाराणसी ने संगीत क्षेत्र में गुरु शिष्य परंपरा एवं संस्थागत शिक्षण प्रणाली के अंतर्गत महत्वपूर्ण अंगों जैसे शारीरिक, बौद्धिक, मानसिक, आध्यात्मिक से जोड़ते हुए अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया।
प्रो, पुष्पम नारायण, एक्स-डीन एवं विभागाध्यक्ष, यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट ऑफ म्यूजिक एंड ड्रामाटिक्स, फैकल्टी ऑफ फाइन आर्ट्स, एल.एन.एम.यू. दरभंगा जी ने शोध के विभिन्न चरणों का वर्णन करते हुए कहा कि संगीत असीमित भंडार है जिसमें नृत्य, गायन, वादन, नाटक विधाओं पर रिसर्च की जा सकती है। इस संदर्भ में उन्होंने बताया कि संगीत में शोध के लिए छोटी विषय का चयन करें।
डॉ राहुल स्वर्णकार, असिस्टेंट प्रोफेसर, तबला, डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर, एम.पी का व्याख्यान ऑनलाइन एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया पर आधारित था। सी. ई. सी. एवं मूक कोर्सेज पर चर्चा करते हुए आपने विभिन्न नॉन गवर्नमेंट एवं गवर्नमेंट संस्थान जैसे स्वयं, ए.आई.सी.टी.ई., इग्नू,आई. आई. एम., एनसीईआरटी आदि की व्याख्या के माध्यम से ऑनलाइन कोर्सेज की महत्ता समझाई।
प्रो, अंजलिका शर्मा, हेड, डिपार्टमेंट ऑफ म्यूजिक, यूनिवर्सिटी ऑफ राजस्थान, जयपुर, ने अपने व्याख्यान में शोध की चर्चा करते हुए संस्थागत शिक्षण में सामने आने वाली समस्याओं का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि छात्र छात्राएं गुरु शिष्य परंपरा के माध्यम से ही अधिकतम सीख पाते हैं। नवीन छात्र छात्राओं को संगीत सिखाने में शिक्षकों को अत्यंत परिश्रम एवं लगन की आवश्यकता होती है।
वेबीनार के तृतीय टेक्निकल सेशन में चेयरपर्सन के रूप में प्रो नीलू शर्मा, डिपार्टमेंट ऑफ म्यूजिक, दयालबाग एजुकेशन इंस्टीट्यूट (डीम्ड यूनिवर्सिटी) आगरा, उपस्थित रही। तृतीय टेक्निकल सेशन में 07 शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। इस सेशन की कोऑर्डिनेटर श्रीमती प्रीति सिंह एवम डॉ शुभा मालवीय थी।
कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन डॉ. वेणु वनिता ( संगीत विभाग) एवं प्रतीक्षा द्वारा किया गया।
इस राष्ट्रीय सेमिनार के आयोजन एवं डॉक्टर शुभा मालवीय, प्रीति सिंह, कौशल एवं हर्षी का विशेष योगदान रहा। वेबीनार के तकनीकी पक्ष को श्रीमान दीपक राठी ने सुचारू रूप से संभाला।
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