एटा। जेबें खाली हैं, तो मन उदास। कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है। ज्योति पर्व दीपावली की धमक भी नहीं। कहावत है कि पैसा नहीं पास, तो मेला लगे उदास। यह कहावत चरितार्थ हो रही है मध्यम वर्गीय लोगों के ऊपर। नौकरीपेशा लोगों की मासिक आय का खत्म हो चुका बजट का नतीजा हो या फिर हर चीज के आसमान छूते रेट, यह पर्व लोगों को खुश नहीं कर पा रहा है।
आज महामाया धन की देवी माता लक्ष्मी और विघ्र विनाशक गणेशजी की पूजा-अर्चना कर दीप जलाकर और पटाखे फोड़कर खुशियां मनाने का महापर्व दीपावली है। यहां तक कि सैनिक पड़ाव में सजीं आतिशबाजी की दुकानों पर भीड़ तो काफी है लेकिन खरीददारी लोग नाममात्र की ही कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि शगुन तो करना ही है। महंगाई की मार ने इस कदर लोगों की कमर तोडी है कि दीपावली पर्व की रंगत लोगों के चेहर से नहीं झलक रही है। बाजारों में भीड़ तो है लेकिन उन लोगों की जिनके पास खरीददारी का बजट है।
वे तो मन मार एकांत में ही बैठे हैं जिनकी जेबें खाली हैं। अधिकांश लोगों का कहना है कि अब तो तीज-त्योहार सिर्फ धनकुबेरों के लिए ही है। वे ही जानते हैं त्योंहारों को मनाना और त्योहार की शोभा बढ़ाना। गरीबों के पास भला है ही क्या सिवाय परंपराओं को निभाने के। इन परिस्थितियों में बेचार वे लोग खुशी के दीपक कैसे जलाएंगे और कहां धन-धान्य की देवी मां लक्ष्मी और गणेशजी की पूजा-अर्चना करंगे। अगर कुछ कर सकते हैं तो सिर्फ अपनी किसमत पर रो सकते हैं। हालातों के हाथों मजबूर ग्र्रामीणों को दर्दभरी हालत बयां करते नहीं बन रही है। तो वहीं शहरियां की हालत भी कुछ ज्यादा अच्छी नहीं है। जिस पर भी हाथ रखो, ऊने-दूने दामों में बिक रही है।
दीपावली पर्व पर मिट्टी के गणेशजी एवं लक्ष्मी जी की मूर्तियों की अस्थाई दुकानें शहर में तमाम जगहों पर सजी हुई हैं। यह मूर्तियां 10 रुपये से लेकर 250 रुपये तक हैं। ऐसे में 10-50 रुपये वाली मूर्तियों की ज्यादा डिमांड चल रही है। खील-खिलौनी भी खरीद रहे हैं तो परंपरा निभाने के लिए मु_ी-चार मु_ी ही। मोमबत्तियों के रट इतने कठोर हैं कि अधिकांश लोग एक पैकेट से ज्यादा खरीदने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं। रही बात मिठाई की तो लोगों की जेब इस कदर तंग है कि वे पर्व पर दूसरों का मुंह मीठा कराने की बात तो सोचना दूर अपने और अपने घरवालों के मुंह मीठा कराने में भी जैसे-तैसे जुगाड़ कर रहे हैं। जेब से तंगहाल लोग पाव-दो-पाव मिठाई ही खरीद रहे हैं। ऐसे में आम आदमी जिसकी आमदनी ज्यादा नहीं है वह दीपावली पर निराश है। आम आदमी के हालात को अगर कुछ यूं बयां किया जाए तो शायद अतिश्योक्ति नहीं होगी।

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