लोकतंत्र के भव्य पटल पर जब आता चुनाव का पर्व ।
शेर बाघ और चिता प्रतिद्वंद्वी बनकर आते मिलकर सर्व।

मोर्चा खोल अलग अलग छेड़ते अपनी हैं वो राग ।
अपने को फिर सगा बताते भूल कर के दिये जो घाव।।

भेड़ियों की वो क्षेत्रीय पार्टी सियारों के वो सोशित दल।
कभी दिखाते आँख लाल कर कभी दिखाते सियारी रंग।।



जंगली कुत्तों ने भी ठान लिया लड़ना है उसे चुनाव।
चाहे टिकट हो पर्टी का या निर्दलीय बन लड़ना चुनाव ।।

असमंजस में हिरण बेचारा करना कैसे अपना मत अधिकार ।
वोट करे या फिर बहिष्कार करे समझ से है उसके पार।।

जब आता टोली बांधकर कभी शेर तो बाघों के झुंड।
कभी दिलाता लालच या फिर कभी दे जाता घुड़की वो झुंड।।

सियार और भेड़िए की टोली जातीबाद दिख जाता।
हिरण समाज को छलने का कुछ नया ही कर जाता।।

जंगली कुत्ते जब आते अपने साथ लेकर कुछ हिरण को साथ।
ये कहते बस मैं ही अपना देखो खड़ा आपका जमात।।

किसपर करे विश्वास हिरण अब सबके पंजे में है धार।
कोई बोटी कोई रुधिर तो कोई हड्डी नोचने को तैयार।।

लोकतंत्र की पावन महिमा हिरण झेल रहा वर्षो से।
सरकार चुनने के इस प्रक्रिया में छलता आया वर्षों से।।

- कमलेश झा
शिवदुर्गा विहार,फरीदाबाद।

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