- विनोद कुमार दुबे

राबर्ट्सगंज, सोनभद्र।

जिला कांगड़ा स्थित धरोहर गांव गरली चंबापतन ब्यास तट के किनारे विराजमान विश्व ऐतिहासिक शक्तिपीठ कालेश्वर महादेव एक ऐसा मंदिर है, जिसका शिंवलिंग जमीन के नीचे यानी गृर्भगृह में स्थापित है। कालीनाथ मंदिर के साथ यहां बह रही ब्यास नदी का पानी विपरीत दिशा की ओर बहने से इस नदी का महत्व और भी विशेष हो जाता है, वहीं कालेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास अज्ञातवास के समय पांडवों व देवी-देवताओं की तपोस्थली से भी जुड़ा हुआ है।



 यही कारण है कि इस स्थल का गंगा नगरी हरिद्वार से भी जौं भर ऊंचा विशेष महत्त्व समझते हुए जिला कांगड़ा से ही नहीं, बल्कि हिमाचल के कोने-कोने से सैकड़ों लोग अपने मृत परिजनों की अस्थियां यहां जल विसर्जन करने आते हैं।
कालेश्वर महादेव का इतिहास-
कालेश्वर में स्थित श्री कालीनाथ मंदिर का इतिहास पांडवों से जुड़ा है। कहा जाता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडव भी यहां रुके थे, जिसका प्रमाण ब्यास नदी तट पर उनके द्वारा बनाई गई पौडिय़ों से मिलता है। कहा जाता है कि पांडव जब यहां आए, तो भारत के पांच प्रसिद्ध तीर्थों हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन, नासिक व रामेश्वरम का जल यहां तीर चलाकर एक ही जगह से निकाला था, जिसे आज ‘पंचतीर्थी स्नान सरोवर  के नाम से जाना जाता है। तभी से पंचतीर्थी में स्नान को हरिद्वार स्नान से ज्यादा  तुल्य माना गया है।
एक अन्य जनश्रुति के अनुसार ये एक तपस्वी स्थल है, इसका प्रमाण इस स्थल पर स्थित ऋषि-मुनियों की समाधियों से मिलता है। इस मंदिर परिसर में भगवान शिव श्री कालीनाथ सहित नौ मंदिर तथा 20 मूर्तियां अवस्थित हैं। अपनी पौराणिकता के कारण यह मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र है

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