जिसकी लाठी उसी की भैंस वाली कहावत साबित हो रही प्रदेश में
  संजय वर्मा

 

मेरठ। प्रदेश में सरकारों में यह कहावत काफी प्रचलित हो रही है। जिसकी लाठी उसी की भैंस । शनिवार को प्रदेश में दशकों से चली आ रही लोकतंत्र की हत्या रस्म एक बार फिर से निभाई गयी। जब 17 जिलों में भाजपा के प्रत्याशी लगभग निर्विरोध जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव जीत गए। इन जिलों में किसी दूसरे प्रत्याशी ने पर्चा ही दाखिल नहीं किया। हालांकि आरोप यह है कि भारतीय जनता पार्टी ने पर्चा दाखिल करने ही नहीं दिया।
हैरानी की बात यह है कि ऐसे जनपदों में भी बीजेपी के अध्यक्ष निर्विरोध चुन लिए गए जहां बीजेपी के पास पर्याप्त बहुमत भी नहीं था। इन जनपदों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्वाचित क्षेत्र वाराणसी और गोरखपुर भी शामिल है। हालांकि इटावा में अखिलेश यादव के चचेरे भाई अभिषेक यादव निर्विरोध चुने गए हैं।
सपा के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आरोप लगाया है कि उनके प्रत्याशियों को बीजेपी ने जबरन रोका है। शायद अखिलेश यादव आरोप लगाते हुए यह भूल गए कि उन्होंने अपनी सरकार में भी यही खेल खेला है। फिलहाल पर्चा दाखिल नही कराने पर अखिलेश यादव ने 11 जिलाध्यक्षों को बर्खास्त कर दिया है।
 
ये बने निर्विरोध भाजपा जिला पंचायत अध्यक्ष
 प्रदेश में जिन जिलों में भारतीय जनता पार्टी के निर्विरोध जिला अध्यक्ष चुने हैं उनमें मेरठ से गौरव चौधरी, मुरादाबाद से डॉक्टर शेफाली सिंह, वाराणसी से पूनम मौर्य, बुलंदशहर से डॉक्टर अतुल तेवतिया, गाजियाबाद से ममता त्यागी, बलरामपुर से आरती तिवारी, नोएडा से अमित चौधरी, मऊ से मनोज राय, झांसी से पवन कुमार गौतमए,गोरखपुर से साधना सिंह, चित्रकूट से अशोक जाटव, बांदा से सुनील पटेल, गोंडा से घनश्याम मिश्र, श्रावस्ती से दद्दन मिश्रा, आगरा से मंजू भदोरिया, ललितपुर से कैलाश निरंजन और अमरोहा से ललित पवार शामिल है।
बता दें कि उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में शनिवार को नामांकन की तारीख थी। इस दौरान ज्यादातर जिलों में भाजपा और सपा के बीच जमकर घमासान मचा। कार्यकर्ताओं को काबू करने के लिए पुलिस तक ही बुलानी पड़ी।
आरोप है कि भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने नामांकन स्थल के मुख्य द्वार पर ही कब्जा कर लिया जिसके चलते सपा प्रत्याशी का पर्चा ही दाखिल नहीं हो पाया। इस दौरान पुलिस सत्ता के दबाव में मूकदर्शक बनी रही।सपा कार्यकर्ताओं का आरोप है कि प्रशासन ने उनके प्रत्याशी का अपहरण कर और छीन लिया है।
मेरठ में भी यही हाल रहा। सपा के अनुमोदक अश्वनी शर्मा एन टाइम पर पाला बदल गए और सपा प्रत्याशी का पर्चा निरस्त हो गया। सपा का आरोप है कि जानबूझकर अश्वनी शर्मा पर प्रशासन के माध्यम से दबाव बनाया गया जिसके चलते उन्होंने पाला बदल लिया। राज्य के दर्जन भर जनपदों में लगभग यही रहा। जो यह बताने के लिए काफी है किस तरह से लोकतंत्र का मजाक उड़ाया जा रहा है।
पिछली सरकारों में रहा यही हाल
ऐसा भी नहीं यह खेल भाजपा सरकार में हो रहा है। बल्कि पिछली सरकारों द्वारा यह खेल खेला गया । 2017 में विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के केवल तीन जिला पंचायत अध्यक्ष थे लेकिन जब योगी सरकार सत्ता में आई तो सपा के ज्यादातर अध्यक्षों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित करा दिया गया। जिसके बलबूते भाजपा ने 22 सीटों पर कब्जा कर लिया। 2012 में सपा शासन में भी ऐसे ही हुआ। समाजवादी पार्टी जब सत्ता में थी तो 36 जिलों में उसके प्रत्याशी निर्विरोध जीत गए थे। उस दौरान भी इन 36 जिलों में विरोधी पार्टी ने पर्चा ही दाखिल नहीं किया था। तब भी प्रशासन पर मिलीभगत के आरोप लगे थे।
बसपा सरकार में भी इस तरह की शिकायतें सामने आई लेकिन चुनाव आयोग हमेशा की तरह मूकदर्शक बना रहा। सवाल यह उठता है कि जब इसी तरह सत्ता पक्ष लाठी के जोर पर चुनाव जीत जाता है फिर जनता के वोट का क्या मतलब रह गया। अगर वाकई में लोकतंत्र को बचाना है तो जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव भी सीधे जनता के वोट से किया जाना चाहिए।

No comments:

Post a Comment

Popular Posts