- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ (हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित व्यंग्यकार)
पति-पत्नी अस्पताल पहुँचे। पति ने पत्नी को बाहर रुकने के लिए कहा। वह डॉक्टर के पास गया। डॉक्टर ने उसे रोगी समझकर पूछा – बताइए आपको क्या समस्या है? पति ने कहा – मेरी पत्नी के पेट की! पाँच महीने पेट से है। डॉक्टर ने कहा – तो फिर पत्नी को बुलाओ। यह सब तो तुम्हारी पत्नी भी बता सकती है। चलो खुशी की बात है कि आप बहुत जल्द पिता बनने वाले हैं। पति ने कहा – डॉक्टर साहब बधाई देने की जरूरत नहीं है। यहाँ हम बच्चा-वच्चा खेलने नहीं आए हैं। हम यह बच्चा गिराना चाहते हैं।
डॉक्टर की आँखें फटी की फटी रह गयी। उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसने पूछा – आखिर आप लोग बच्चा क्यों गिराना चाहते हैं? हमारे परिचित एक डॉक्टर ने दस हजार रुपए लेकर हमें बताया कि गर्भ में लड़का नहीं लड़की है। मैंने उससे प्रार्थना की कि वह यह गर्भ गिरा दें। लेकिन इसके लिए वह तीस हजार रुपए मांगने लगा। इसीलिए आपके पास आए हैं। सुना है कि आप कम पैसों में इलाज करते हैं। डॉक्टर ने पत्नी की ओर देखते हुए कहा – क्या तुम्हें बच्चा गिराना पसंद है? यह कोई ट्यूमर नहीं जो निकाल दें तो तबियत ठीक हो जाएगी। यह एक जीता-जागता तुम्हारा अंश है। जिगर का टुकड़ा है। डॉक्टर को टोकते हुए पति ने कहा – ज्यादा बक-बक मत करो। हम तुम्हारा भाषण सुनने नहीं आए हैं। बच्चा गिराने की क्या कीमत लोगे बताओ। डॉक्टर ने पति को लताड़ते हुए कहा – अपनी हद में रह कर बात करो। एक फोन कॉल करूँगा तो तुम्हारा और तुम्हारे उस डॉक्टर का सारा काला चिट्ठा बाहर निकल आएगा। ऐसे नपोगे कि जेल से बाहर नहीं निकल पाओगे। पत्नी डॉक्टर के सामने सिर झुकाए खड़ी थी। डॉक्टर ने कहा – गलियों, सड़कों, मोहल्लो, पार्कों, कॉलेजों आदि जगहों में लड़की की असुरक्षित है, यह मैं जानता और मानता भी हूँ। किंतु माँ का गर्भ ही उसे लीलने लगे तो लड़कियाँ धरती पर कैसे जन्म लेंगी। यदि तुम्हारा पति मन बदलकर तुम्हारी संतान को अपनाता है तो ठीक है। नहीं तो उसे छोड़ दो। ऐसे लापरवाह और निर्दयी पति से अच्छी तुम्हारी संतान है। उसका अच्छे से पालन-पोषण करो, वह तुम्हारा सहारा बनेगी। पत्नी की आँखें छलक उठीं। वह एक नए आत्मविश्वास से वहाँ से चल पड़ी।
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