डा. जगदीश सिंह दीक्षित - एसो. प्रोफेसर (रिटा.) टीडी कालेज, जौनपुर।
कोरोना संक्रमण के दौर में लगे लाकडाउन से प्रतिबल या तनाव आज समाज की एक बड़ी समस्या है। अध्ययनों से पता चलता है कि अधिकांश रोगों के मूल में यह तनाव ही मुख्य कारण है। यहाँ तक कि हृदय रोग, कैन्सर, गठिया जैसी बीमारियों के पीछे यह तनाव ही मुख्य कारण बन चुका है। मनोवैज्ञानिकों ने अलग-अलग ढंग से तनाव को परिभाषित करने का प्रयास किया है। कुछ मनोवैज्ञानिकों ने तनाव को उद्दीपक कारकों के रूप में व्याख्यायित करने का प्रयास किया है तो कुछ ने तनाव को अनुक्रिया के रूप में।
मनोवैज्ञानिकों का एक वर्ग इसे उद्दीपक एवं अनुक्रिया के संबंध के आधार पर व्याख्यायित करने का प्रयास किया है । एक मनोवैज्ञानिक बेरोन का मत है कि- तनाव एक ऐसी बहुआयामी प्रक्रिया है जो हमलोगों में वैसी घटनाओं के प्रति अनुक्रिया के रूप में उत्पन्न होती है जो हमारे दैहिक एवं मनोवैज्ञानिक कार्यों को विघटित करता है । प्रतिबल या तनाव में जो जो घटनाएं या परिस्थितियां आदि होती हैं (जिनमें तनाव उत्पन्न होता है) वे व्यक्ति के नियंत्रण के बाहर होती हैं। इसमें दैहिक एवं मनोवैज्ञानिक दोनों ही तरह की अनुक्रियाएं होती हैं। इस प्रकार तनाव परिस्थिति या घटना का मूल्यांकन करने के बाद उसके प्रति की गई विशेष अनुक्रिया होती है जिसमें व्यक्ति अपने मानसिक एवं दैहिक कार्यों को विघटित होते पाता है। प्रतिबल या तनाव में मनोवैज्ञानिक एवं दैहिक दोनों ही तरह की अनुक्रिया होती हैं । तनाव में विशेष रूप से जो मनोवैज्ञानिक अनुक्रियाएं होती हैं उनमें मुख्य रूप से संज्ञानात्मक, सांवेगिक जैसे-'चिंता, क्रोध, आक्रामकता, भावशून्यता, विषाद आदि। दैहिक अनुक्रियाओं में विशेषकर- श्वसन गति में परिवर्तन ; मुँह सूख जाना, रक्तचाप बढ़ जाना आदि। प्रतिबल या तनाव उत्पन्न करने के अनेक कारण होते हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं-तनावपूर्ण जीवन की घटनाएं,प्रेरकों का संघर्ष अर्थात द्वंद्वात्मक स्थितियां, कार्य उत्पन्न तनाव, कुण्ठा, कुछ पर्यावरणीय समस्याएं होती हैं जो व्यक्ति के अंदर तनाव उत्पन्न करती हैं । तनाव को कैसे कम किया जा सकता है। इसके भी अनेक उपाय मनोवैज्ञानिकों ने सुझाए हैं। एक उपाय यह है कि व्यक्ति जो भी तनाव उत्पन्न करने का कारण है उसे अपने ऊपर हावी न होने दे। उसके साथ समायोजन स्थापित करने का प्रयास करे। जो भी समस्या है उसका समाधान करने का प्रयास करे। कभी भी समस्या को यह न मानकर न चले कि इसका समाधान नहीं हो पायेगा। उसे समस्या केन्द्रित उपायों को ढूंढना होगा, जो घटनाएं सांवेगिक तनाव उत्पन्न करने का कारण हैं उनकी खोज करके इस तरह के व्यवहारिक उपायों को करने की जरूरत होती है जिससे तनाव उत्पन्न ही न हो। रक्षात्मक उपायों जैसे-दमन, प्रतिक्रिया निर्माण, यौक्तीकरण, प्रक्षेपण, विस्थापन, अस्वीकरण, बौद्धिकीकरण का उपयोग तनाव दूर करने में किया जा सकता है, लेकिन इन रक्षात्मक उपायों का अत्यधिक उपयोग करने से बचना चाहिए । प्रतिबल या तनाव का प्रबंधन भी आवश्यक होता है। इसके कई तरीके हैं, जिनके द्वारा तनाव का प्रबंधन किया जा सकता है। वैयक्तिक उपागम, पर्यावरणीय परिवर्तन उपागम। इन उपागमों का उपयोग सही ढंग से करके तनाव को कम किया जा सकता है। वास्तव में प्रतिबल या तनाव प्रबंधन की कई प्रविधियां हैं। इनका संयुक्त रूप से उपयोग करके व्यक्ति तनावमुक्त जीवन व्यतीत कर सकता है।
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