व्यंग्य विधा के प्रति समर्पित समकालीन व्यंग्य मंच के विमर्श के केंद्र में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का एक ट्वीट पर था। समकालीन व्यंग्य मंच पर व्यंग्य की समझ रखने वाले व्यंग्य के पारखियों ने भी अपने-अपने विचार अभिव्यक्त किए।
दरअसल कुछ दिन पहले अपने ट्वीट में अमिताभ ने लिखा था - “ Sarcasm is the language in which one tries to speak the faults of others but ends up exposing one’s weakness ..” यानी कि व्यंग्य वो भाषा होती है जहाँ कोई एक, किसी दूसरे की ग़लतियों के बारे में बोलने की कोशिश करता है ; पर अंत में अपनी ही कमज़ोरियों का प्रदर्शन करता है। (ट्विटर पर इसी तरह अनुदित है)।

रतलाम (मप्र) से आशीष दशोत्तर ने कहा कि व्यंग्य होता ही आईना दिखाने के लिए है। कोई चेहरा कैसा है इसे आईना ही बेहतर दिखा सकता है। आईने में ही तमाम सच्चाईयां उजागर होती है। व्यंग्य भी किसी व्यक्ति, विषय या परिस्थिति की वास्तविकता से परिचित करवाता है। जब व्यंग्यकार किसी को आईना दिखाते वक्त स्वयं को बेदाग़ समझने लगता है और ज़रूरत से ज्यादा कहने की कोशिश करता है, तो वह स्वयं भी बेनकाब हो जाता है। यानी किसी को आईना दिखाते वक्त यह भी ध्यान रखना ज़रूरी होता है कि यह आईना कभी खुद से भी मुखातिब हो सकता है।



इंदौर से वरिष्ठ व्यंग्यकार ब्रजेश कानूनगो के अनुसार व्यंग्य एक ऐसी विधा है जो विसंगतियों, विडम्बनाओं और गलत के प्रति अपना अभिमत प्रस्तुत करती है जो अंततः समाज की बुराइयों को दूर करने के लिए संकेत करती है। ईमानदार व्यंग्य लेखन में तो किसी को अपमानित करना, नीचा दिखाना, नंगा कर देना जैसा कोई मन्तव्य तो कतई होता ही नहीं। यदि ऐसा है भी तो वह कटाक्ष अथवा निजी गाली गलौच से ज्यादा  कुछ नहीं हो सकता। वह व्यंग्य नहीं है। व्यंग्य के बारे में यदि अमिताभ के यह विचार हैं तो मुझे विश्वास है कि यह अधूरा और अपूर्ण है। या इसका अनुवाद गलत हुआ है। सम्भवतः अमिताभ का आशय 'कटाक्ष' या 'तंज' से होना चाहिए।

डॉ. प्रदीप उपाध्याय के अनुसार किसी पर ताना मारना, कटाक्ष करना, तंज कसना व्यंग्य नहीं है। व्यंग्य व्यक्ति सापेक्ष नहीं है। यह प्रवृत्तियों पर किया जाता है यानी इसका प्रभाव सामूहिकता पर पड़ता है।
जयपुर, राजस्थान से प्रभात गोस्वामी के अनुसार व्यंग्य यदि व्यक्ति केंद्रित होता तो दूसरे की गलतियों पर बोलने की संभावनाएँ कहीं अधिक होतीं । एक तटस्थ व्यंग्यकार वही है जो अपने भीतर की कमियों, कमजोरियों, विसंगतियों पर भी कटाक्ष करे।
फरीदाबाद हरियाणा से डॉ. दुर्गा सिन्हा ‘उदार’ के अनुसार समाज की, सरकार की, राजनीति की, व्यापार की, शिक्षा जगत की, कुछ बुराइयों पर कटाक्ष करने वाला न राजनीति में होता है, न सरकार में। ज़रूरी नहीं कि वह स्वयं प्रभावित भी हो, पर महसूस करने पर व्यंग्य की भाषा में औरों को सजग करने का प्रयास तो करता है, लेकिन समाज के भले के लिए। व्यंग्य को सकारात्मकता से लेना ही उचित है।
वाराणसी से सूर्यदीप कुशवाहा के अनुसार व्यंग्य सामाजिक, व्यक्तिपरक विसंगतियों को चुटीले शब्दावलियों से उजागर कर ध्यानाकृष्ट कराती है।व्यंग्य का कार्य ही है विद्रुपदाओं पर मारक प्रहार करना।
संजीव शुक्ल ‘अतुल’ के अनुसार साहित्य की विधा के रूप में व्यंग्य समाज की विसंगतियों को उद्घाटित कर स्वस्थ दृष्टि के स्थापन के प्रति आग्रहशील होता है। यद्यपि शैली एक जैसी हो सकती है पर वह साहित्य की व्यंग्य विधा से अलग है। उनके ट्वीट से व्यक्तिगत आचरण और गलतियों के बारे में किये जाने वाले आरोप-प्रत्यारोप का भान मिलता है। बच्चन जी ने यह बात संभवत: राजनीति से संबंधित कही हो, व्यंग्य की परिभाषा देना या चर्चा करना उनका उद्देश्य नहीं दिखता।


प्रसिद्ध आलोचक प्रो. सेवाराम त्रिपाठी के अनुसार व्यंग्य व्यंजित भर नहीं होता, वह ध्वनित भी होता है और असली औकात का खुलासा भी करता है। हरि शंकर परसाई का मानना है कि व्यंग्य जीवन से साक्षात्कर करता है, विसंगतियों, मिथ्या चारों और पाखंडों का पर्दाफाश करता है। व्यंग्य में गम्भीरता की बेहद कमी है और व्यंग्य की धार की कमी भी। व्यंग्य दूसरों को आईना दिखाता है लेकिन कुछ लोगों को छोड दें तो अपनों को ही आइना दिखाना भूल जाता है।



समकालीन व्यंग्य मंच के प्रमुख संचालक रामस्वरूप दीक्षित ने बुधवारी विमर्श का निष्कर्ष कुछ इस तरह बतया - किसी कथित सेलेब्रिटी द्वारा कही गई किसी अनर्गल बात पर हमें अपनी लेखकीय ऊर्जा जाया नहीं करनी चाहिए। चीजें बढ़ाने से बढ़ती हैं। असंगत बातों को तरजीह दिये जाने की प्रवृत्ति ने ही इस मानसिकता को चलन में ला दिया है। लेखक समाज का हिस्सा तो है, मगर भीड़ का नहीं। सारी दुनिया के विरोध के बाद भी जो अपने साथ खड़े रहने का साहस कर सके, सच्चे अर्थों में वही लेखक है।
इस चर्चा में बेंगलूरु से दीपास्वामीनाथन, प्रभाशंकर उपाध्याय, संजीव निगम, आनंदकृष्ण, विवेकरंजन श्रीवास्तवव आदि ख्यातिप्राप्त लेखकों ने सक्रिय सहभागिता प्रदर्शित की।

- प्रस्तुति- डा.सुरेश कुमार मिश्रा

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