क्या रद्द हो सकते हैं पिछले दो साल के चुनाव? बंगाल से महाराष्ट्र तक दोबारा मतदान की मांग, जानिए क्या कहता है संविधान
खड़गे ने उठाई चुनाव रद्द करने और बैलेट पेपर से मतदान कराने की मांग, राहुल गांधी ने 2024 के लोकसभा चुनाव पर भी उठाए सवाल; कानून में हर सीट का चुनाव अलग-अलग चुनौती देने का प्रावधान
नई दिल्ली। देश की राजनीति में चुनावों की निष्पक्षता को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस और INDIA गठबंधन ने पिछले दो वर्षों में हुए लोकसभा और विधानसभा चुनावों को रद्द कराकर दोबारा मतदान कराने की मांग उठाई है। विपक्ष के निशाने पर पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार समेत कई राज्यों के चुनाव हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग की है, जबकि राहुल गांधी ने 2024 के लोकसभा चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, बड़ा सवाल यह है कि क्या राजनीतिक मांग के आधार पर चुनी हुई सरकारों को हटाकर दोबारा चुनाव कराए जा सकते हैं?
विपक्ष के आरोपों के बाद गरमाई सियासत
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने 25 अक्टूबर को पटना में आयोजित कार्यक्रम में पिछले दो वर्षों में हुए विधानसभा चुनाव रद्द करने की मांग उठाई थी। उन्होंने पश्चिम बंगाल, हरियाणा, बिहार और महाराष्ट्र का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि इन राज्यों में जनादेश के साथ खिलवाड़ कर सरकारें बनाई गईं। विपक्ष ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर रोक लगाने और हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने की मांग भी की है।
इससे पहले INDIA गठबंधन के नेताओं ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को ज्ञापन सौंपकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने, SIR रोकने और करीब 13.30 करोड़ मतदाताओं के नाम बहाल करने की मांग की थी। 31 अक्टूबर को राहुल गांधी ने 2024 के लोकसभा चुनाव को भी अवैध बताते हुए आरोप लगाया कि मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने का चुनाव परिणामों पर असर पड़ा।
क्या दोबारा हो सकते हैं चुनाव?
कानून में चुनाव रद्द करने और दोबारा मतदान कराने का प्रावधान जरूर है, लेकिन इसके लिए ठोस कानूनी आधार और निर्धारित प्रक्रिया जरूरी है। किसी राजनीतिक दल के आरोप लगाने या चुनाव परिणामों पर सवाल उठाने भर से चुनाव रद्द नहीं हो जाता।
संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को चुनाव प्रक्रिया की निगरानी और संचालन का अधिकार प्राप्त है। मतदान के दौरान बूथ कैप्चरिंग, हिंसा या गंभीर अनियमितता सामने आने पर कानून के अनुसार संबंधित बूथ या क्षेत्र में दोबारा मतदान कराया जा सकता है। लेकिन पूरे राज्य का चुनाव रद्द करने का अधिकार असीमित नहीं है।
चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद उसे चुनौती देने का रास्ता चुनाव याचिका है। संबंधित हाईकोर्ट सबूतों और तथ्यों की जांच के बाद तय करता है कि चुनाव में ऐसी अनियमितता हुई थी या नहीं, जिससे परिणाम प्रभावित हुआ।
45 दिन के भीतर हाईकोर्ट में याचिका जरूरी
जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 में चुनाव को चुनौती देने के लिए स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं।
धारा 80: किसी चुनाव को चुनौती केवल चुनाव याचिका के माध्यम से दी जा सकती है।
धारा 81: चुनाव परिणाम घोषित होने के 45 दिनों के भीतर चुनाव याचिका दाखिल करनी होती है। इसके लिए संबंधित उम्मीदवार या उस क्षेत्र का मतदाता पात्र होता है।
धारा 100: यदि चुनाव में भ्रष्ट तरीके अपनाए गए, उम्मीदवार का नामांकन गलत तरीके से स्वीकार या खारिज किया गया अथवा मतदान और मतगणना में ऐसी गंभीर गड़बड़ी हुई जिससे परिणाम प्रभावित हुआ, तो हाईकोर्ट चुनाव रद्द कर सकता है।
इसके अलावा संविधान का अनुच्छेद 329 (बी) भी चुनावी विवादों को चुनाव याचिका के जरिए चुनौती देने की व्यवस्था करता है।
पूरे राज्य का चुनाव रद्द करना आसान नहीं
कानूनी प्रावधानों के मुताबिक विधानसभा की प्रत्येक सीट का चुनाव अलग-अलग माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट के इंद्रजीत बरुआ बनाम चुनाव आयोग मामले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया गया है कि पूरे विधानसभा चुनाव को एक इकाई मानकर चुनौती नहीं दी जा सकती।
इसका अर्थ है कि यदि किसी राज्य की सभी सीटों पर गड़बड़ी का आरोप लगाया जाता है, तो भी संबंधित सीटों के चुनाव को कानूनी प्रक्रिया के तहत चुनौती देनी होगी। गड़बड़ी और उसके चुनाव परिणाम पर प्रभाव के प्रमाण भी जरूरी होंगे।
राजनीतिक मांग और कानूनी हकीकत में बड़ा अंतर
विपक्ष की मांग के बावजूद बंगाल, महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार या अन्य राज्यों में तत्काल दोबारा चुनाव कराने का कोई स्वत: संवैधानिक रास्ता नहीं है। इसके लिए संबंधित चुनावों को कानून के तहत चुनौती देनी होगी और सक्षम अदालत या चुनाव प्राधिकरण के सामने अनियमितताओं को साबित करना होगा।


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