जन्माष्टमी : बाहर नहीं, अपने भीतर श्रीकृष्ण को जन्म देने का उत्सव:गुरुदेव श्री श्री रविशंकर
आनंद, प्रेम, ज्ञान और संतुलन को जीवन में उतारने का संदेश देते हैं श्रीकृष्ण
कृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का पर्व है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से यह केवल हजारों वर्ष पुरानी घटना को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि अपने भीतर आनंद, प्रेम, ज्ञान और जीवन की अनंत संभावनाओं को जगाने का पर्व भी है। आध्यात्मिक गुरु एवं मोटिवेशनल स्पीकर गुरुदेव श्री श्री रविशंकर के अनुसार, जन्माष्टमी का वास्तविक संदेश तभी सार्थक होता है, जब हम श्रीकृष्ण के गुणों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें।
कृष्ण हैं अनंत चेतना के प्रतीक
‘कृष्ण’ का एक अर्थ सबसे अधिक आकर्षक है। आध्यात्मिक अर्थ में कृष्ण उस ‘स्व’ के प्रतीक हैं, जो प्रत्येक जीव में जीवन का आधार है। उनका नीला रंग अनंतता का संकेत देता है। जैसे आकाश और समुद्र की कोई सीमा दिखाई नहीं देती, वैसे ही मनुष्य के भीतर की चेतना भी शरीर और व्यक्तित्व की सीमाओं से कहीं अधिक व्यापक है।
कृष्ण का जन्म आधी रात को हुआ। आध्यात्मिक व्याख्या में जन्मकथा के पहरेदार पांच इंद्रियों के प्रतीक माने जाते हैं। जब इंद्रियां शांत होती हैं और मन बाहरी संसार से हटकर भीतर की ओर मुड़ता है, तभी व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप की झलक पा सकता है।
देवकी शरीर, वसुदेव प्राण और कंस अहंकार
कृष्ण की जन्मकथा में देवकी और वसुदेव का भी प्रतीकात्मक अर्थ बताया गया है। देवकी शरीर और वसुदेव प्राण अथवा श्वास के प्रतीक हैं, जबकि कंस अहंकार का प्रतिनिधित्व करता है।
वसुदेव बाल कृष्ण को टोकरी में रखकर उफनती यमुना को पार करते हैं। यमुना को प्रेम का प्रतीक माना गया है। संकट के बीच बाल कृष्ण का स्पर्श जल को शांत करता है। यह प्रसंग संदेश देता है कि कठिन परिस्थितियों में भी विश्वास बनाए रखने पर जीवन में किसी उच्चतर शक्ति का सहारा अनुभव किया जा सकता है।
यशोदा श्रद्धा तो राधा प्रेम की प्रतीक
कृष्ण का पालन-पोषण यशोदा के घर होता है। यशोदा श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक हैं। श्रद्धा से भीतर आनंद जन्म लेता है। वहीं राधा परमात्मा के प्रति गहरी लालसा और प्रेम की प्रतीक हैं। जब यह लालसा पूर्ण होती है तो वही प्रेम में बदल जाती है।
‘राधे-श्याम’ व्यक्तिगत और अनंत जीवन के मिलन का प्रतीक माना जाता है। संदेश स्पष्ट है कि मनुष्य को अपनी जिम्मेदारियों से भागना नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें निभाते हुए अपनी वास्तविक पहचान को समझना चाहिए।
बांसुरी सिखाती है मन को खाली रखना
श्रीकृष्ण की बांसुरी जीवन का गहरा संदेश देती है। बांसुरी भीतर से खाली होती है और उसमें संगीत तभी पैदा होता है, जब प्राण उसमें प्रवाहित होता है। इसी प्रकार जब मन शिकायतों, अपेक्षाओं और धारणाओं से थोड़ा खाली होता है, तब वह किसी बड़ी शक्ति का सुंदर माध्यम बन सकता है।
कृष्ण की मुद्रा भी संतुलित जीवन का संदेश देती है। एक पैर धरती पर मजबूती से टिका है और दूसरा हल्केपन से उठा हुआ। अर्थात संसार में अपनी जिम्मेदारियां निभाते हुए भी भीतर से हल्का और संतुलित रहना ही जीवन की कला है।
कृष्ण के हर रूप में छिपी है जीवन की सीख
कृष्ण का व्यक्तित्व किसी एक रूप तक सीमित नहीं है। वे नटखट बालक हैं, मित्र हैं, सारथी हैं, योगेश्वर हैं, शिक्षक हैं और कुशल राजनीतिज्ञ भी। वे द्वारकाधीश हैं तो योगेश्वर भी।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वे संसार से दूर नहीं भागते। वे जीवन की विविध परिस्थितियों के बीच रहते हुए भी अपने भीतर के सत्य से जुड़े रहते हैं।
‘माखन चोर’ : जीवन के मंथन से निर्मलता
कृष्ण को ‘माखन चोर’ भी कहा जाता है। दूध से दही और दही को मथने पर मक्खन निकलता है। उसी तरह जीवन के सुख-दुख और अनुभव मनुष्य को लगातार मथते हैं। इस मंथन से भीतर की कोमलता, निर्मलता और संतत्व प्रकट हो सकता है।
कृष्ण का माखन चुराना इसी निर्मल और कोमल मन के प्रति उनके प्रेम का प्रतीक माना जाता है।
इस जन्माष्टमी अपने भीतर कृष्ण को जन्म लेने दें
जीवन का मंथन हमारी कठोरता बढ़ाने के बजाय हमारी कोमलता जगाए। श्रद्धा प्रेम में और प्रेम समर्पण में बदल जाए। श्रीकृष्ण के आनंद, ज्ञान, प्रेम, साहस और संतुलन को जीवन में उतारने का प्रयास हो।
इस जन्माष्टमी केवल बाहर श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव न मनाएं, बल्कि अपने भीतर भी कृष्ण को जन्म लेने दें। मन को इतना सहज और निर्मल बनाएं कि उसमें से प्रेम और आनंद प्रवाहित हो सके।
विशेष संदेश
“जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी भीतर से हल्का और संतुलित रहना—यही श्रीकृष्ण के जीवन से मिलने वाली बड़ी सीख है।”
सभी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं।



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