वाह कितने स्मार्ट हैं हम...!  

- ललिता जोशी
स्मार्ट शब्द उच्चरित करते ही हमें चुस्त -दुरुस्त व्यवस्था का ध्यान आता है । यदि स्मार्ट  शब्द किसी व्यक्ति के साथ प्रयुक्त किया जाये तो बस एक ही छवि मन में आती है कि वो सुदर्शन व्यक्तित्व का और प्रतिभाशाली होगा । ऐसे ही जब स्मार्ट सिटी की चर्चा होती है तो बस यही लगता है की सपनों का एक ऐसा शहर जहां न कोई गंदगी, न कोई पावर कट न ही कोई जल जमाव , न ही रास्तों और सड़कों पर कोई गड्ढे यानि चमचमाती सड़कें । ट्रेफिक से लेकर अभी जन सुविधाएं जैसे स्वास्थ्य और कानून ,शिक्षा व्यवस्था इत्यादि एकदम टनाटन ।

स्मार्ट सिटी के नाम पर अरबों रुपए खर्च हो गए लेकिन एक बारिश स्मार्ट सिटी की पोल के ढ़ोल बजा देती है । बारिश की फुहारें हो या झमाझम बारिश हो जाए तो जगह -जगह जल भराव, ट्रेफिक जाम से हैरान परेशान आम लोगों के लिए घर से दफ्तर और दफ्तर से घर पहुँचना मानों जान हथेली पर लेकर चलना हो मानो हर्मुज जलडमरू मध्य से निकल आएं हो । घंटों तक रास्तों में बंधक बने रहते हैं लोग ।

अब बात कर लें मेट्रो की उसमें लगी लंबी -लंबी लाइनें और उसकी रफ्तार पर ब्रेक लग जाए तो कहना ही क्या । सोने पर सुहागा हो जाता है ।  कहीं पर सीवर का गंदा पानी अपने उफान पर होता है तो कहीं जल आपूर्ति व्यवस्था का ऐसा  झोल होता है कि नलों में नाले का पानी आ रहा होता है । बेचारा पानी भी कुसंगति के कारण बदनाम हो जाता है और गंदा पानी कहलाता है । हैजा , डेंगू ,टाइफाइड ,चिकनगुनिया ,पीलिया ,हर मौसम के मौसमी बुखार भी लोगों को भेंट स्वरूप मिलते रहते हैं । हम इतने पर ही कहाँ रुकते हैं । अगर कोई प्राकृतिक आपदा आ जाए या फिर किस और प्रकार की मानव प्रद्द्त आपदा प्रकट हो जाए तो फिर अपने देश में सभी स्मार्ट हो जाते हैं ।सिविक एजेंसियां अपनी ज़िम्मेदारी से कतराते हुए एक दूसरे पर आरोप -प्रत्यारोप  लगाना शुरू कार देते हैं । इसमें पिसती है आम जनता ।

अमरीका -इज़राइल और ईरान युद्ध के कारण एलपीजी सिलेंडरों की कमी हुई तो शुरू हो गई लंबी -लंबी लाइनें सिलेंडरों के लिए । गाँव और शहर दोनों ही सिलेंडरों की किल्लत से झूझ रहे थे और जमाखोर अपने काम पर मुस्तैदी से लगे हुए थे । चारों दिशाओं में इसके लिए हाहाकार मचा हुआ था  । कोई सिलेंडरों की जमाखोरी में लगा था तो अपने डोमेस्टिक कनैक्शन वाले सिलेंडरों को ढाबों तक पहुंचा कर उनके संकटमोचन बन रहे थे । परोपकार करना आदमी का कर्तव्य है । परोपकार करेंगे तो ईश्वर उसका फल देंगे और साथ में लोगों की दुआएं भी मिलेंगी । कितने सबाब का काम है एक के साथ एक फ्री स्कीम । कितने स्मार्ट बन चुके हैं हम । हैं ना !

हमारे एक्सप्रेस वे और हाइवे भी स्मार्ट हैं उफ मगर एक बारिश हुई तो बस ये गड्ढों को अपनी आगोश में ऐसे लेते हैं जैसे प्रेमी अपनी प्रेमिका को या फिर मान अपने बच्चे को गोद में ले लेती है । कितना प्यारा रिश्ता है गड्ढों और एक्सप्रेस वे और हाइवे का । जैसे की दोनों एक दूजे के लिए के बने हों । पुल बनते हैं गिरने के लिए और टनल का निर्माण एक बारिश में ढहने के लिए किया जाता है मरते हैं निर्माण कार्य में लगे मजदूर क्योंकि वो स्मार्ट नहीं होते ।

अरे भाई स्मार्टनेस की बात चले और  किचन चर्चा में न आएं । एलपीजी की किल्लत ने किचन को भी स्मार्ट बनाने की अवधारणा पर ज़ोर दिया जा रहा है। किचन स्मार्ट कैसे बनाया जाए ?ये एक यक्ष प्रश्न बन गया था । क्या हमारे किचन इससे पहले बेकार थे ? क्या उसमें खाना नहीं बनता था ? एलपीजी की किल्लत ने किचन का सारा भार  स्मार्ट किचन के कंधों  पर डाल दिया । स्मार्ट किचन की अवधारणा है क्या इस प्रश्न का उत्तर, तो हमारे विशेषज्ञों और मीडिया हाउस चाहे वो प्रिंट हो या फिर इलेक्ट्रोनिक ,ने दे दिया । स्मार्ट किचन यानि खाना पकाने के लिए बिजली से चलने वाला चूल्हा और बिजली और सौर ऊर्जा से चलने वाले कूकर इत्यादि जैसे कुकिंग उपकरण । जैसे ही स्मार्ट किचन के स्मार्ट गेजेट्स की चर्चा में आए तो तो इनकी कीमतें आसमान छूने लगीं । जैसे की वो किचन के मोस्ट सूटेबल बॉय्ज़ हों । इनकी कीमतें भी दूल्हों की कीमत तरह ही  बढ़ती चली गईं  और लड़की के माता -पिता यानि गृहस्वामी उसका दाम चुकाने के लिए तैयार थे  ताकि उनकी बिटिया(पत्नी या कुक ) का वैवाहिक जीवन सुखमय रहेगा । ये कीमत डिमांड और सप्लाई उनके वर्कप्रोफाइल और उसके परिवार के आधार पर होती है ।

ऐसे ही मांग और आपूर्ति  का ये सिद्धांत इलेक्ट्रिक गेजेट पर भी लागू हो रहा था और अब तो ये 1000 -1200 वाले इंडक्शन प्लेट अब तिगुने और चोगुने दामों में बिक रहे थे । इतना ही नहीं ये आउट ऑफ स्टॉक भी होने लगे ।  लोग हैरान परेशान होकर इन्हें ऊंचे दामों पर खरीदने को मजबूर हो थे । लोगों को अपने बच्चों और घर के बुजुर्गों को खाना तो खिलाना था । इसी कारण  हमारे दुकानदार बहुत ही स्मार्ट बनकर आपदा में अवसर तलाश मालामाल हो गए । जहां मांग बढ़ी वहीं मनमानी कीमतें वसूलने लग जाओ । ये हमारा चरित्र है । हैं न  हम स्मार्ट। चलो भई स्मार्ट किचन तो बन गया लेकिन ये गेजेट चलेंगे तो बिजली से । जब बिजली ही नहीं होगी तो गेजेट कैसे चलेंगे । बिजली की सप्लाई हर प्रदेश और कॉलोनी में निर्बाध नहीं होती । जब घंटो–घंटों के लिए पावर कट हो तो कोई कैसे पकाए और खाये । धरे के  धरे रह जाते हैं स्मार्ट किचन और उसके गेजेट्स । भई किचन स्मार्ट हो न हो होर्मुज जलडमरू मध्य  ने उपभोक्ताओं  और विक्रेताओं  को स्मार्ट बना दिया है ।

स्मार्ट तो व्यक्ति को उसके वस्त्र भी बनाते हैं । फैशन शो के स्मार्ट कपड़ों को कौन पहन सकता है रोज़मर्रा के जीवन में । आदमी को स्मार्ट बनाते हैं उसके काम । लेकिन आजकल ड्रेस भी स्मार्ट हैं तो इंसानों का क्या कहना । आजकल तो दूसरों से अपना उल्लू सीधा करने वाला स्मार्ट माना जाता है । नियम कायदे से चलने वाला स्मार्ट नहीं लकीर का फकीर कहलाता है । ठीक ऐसे ही  पेपर लीक के कारण उसे खरीद कर परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले स्मार्ट कहलाए और मेहनत करने के बावजूद असफल होने वाले अभागे । अब तो सरकार ने ऐसे  स्मार्ट छात्रों और अधिकारियों के लिए सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम )संशोधन अधिमियम ,2026 लागू कर सख्त कानून बना दिया है लेकिन बावजूद इसके पेपर लीक हुए बिना मान ही  नहीं रहे हैं ।
टोल रोड पर टोल टैक्स न देने वाले अपने आप को स्मार्ट समझते हैं । मंहगें हवाई टिकट खरीदकर हवाई यात्रा करने वालों के साथ एयरलाइंस कंपनियाँ अपने यात्रियों के साथ कैसा व्यवहार करती हैं ये जगजाहिर है ।

कितने स्मार्ट हैं ये जो अपने उपभोक्ताओं को सेवाएँ देने के बदले चूना लगाती हैं । खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वाले , नकली दवाइयाँ और नकली सौंदर्य प्रसाधन बनाने वाले भी स्मार्ट लोगों की श्रेणी में ही आते हैं क्योंकि दाम तो असल माल के वसूले जाते हैं मगर दिया जाता है नकली माल । हैं ना हम स्मार्ट । ऐसे ही देश की भावी पीढ़ी को मिड डे मील में पानी की सब्जी ,कीड़े वाली खिचड़ी ,पानी में दूध देते स्कूल वाले कितने स्मार्ट हैं हम । सरकार फ़ंड दे रही है पौष्टिक आहार के मजे उड़ाते हैं और लोग । भ्रष्टाचार में आकंठ लिप्त नौकरशाह और राजनेताओं का गठबंधन जब तक स्मार्ट तरीके से चलता है तक तक सब कुछ आनंद में चलता है । जब पकड़े गए तो चुप्पी साध लो ये भी स्मार्ट तरीका है । वैसे आम जनता से लेकर खास सभी स्मार्ट तरीके खोजते हैं अपनी हैसियत के अनुसार । कोई बिजली की चोरी कर, तो कोई संसाधनों की तो कोई टैक्स की कर ,कोई दान की, तो कोई बैंक में सेंधमारी कर खुद को स्मार्ट समझता है । स्मार्ट की परिभाषा कितनी स्मार्ट है जनाब  !
स्मार्ट की कथा अनंत है । क्या लिखूँ और क्या छोड़ूँ ......... विश्वगुरू हैं हम !
(मुनिरका एन्क्लेव, दिल्ली)

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