इलमा अज़ीम
हिमालय लगातार खतरनाक आपदाओं के रूप में एक के बाद एक चेतावनियां दे रहा है- जैसे अचानक बाढ़, हिमस्खलन, ग्लेशियल झील के फटने से आई बाढ़, बादल फटना, भूस्खलन और ज़मीन का बुरी तरह धंसना। हमने केदारनाथ, धौलीगंगा, जोशीमठ, सिक्किम और अब नेपाल में इन्हें होते देखा है, अपने पीछे भारी तबाही छोड़ते हुए। हर आपदा के बाद, ग्लेशियरों की निगरानी, आरंभिक चेतावनी प्रणालियां विकसित करने, खतरे और जोखिमों की मैपिंग करने और बचाव संबंधी एवं नुकसान कम से कम रखने के उपाय करने की बातें होती हैं। कुछ हफ़्तों या महीनों के बाद, शोर-शराबा थम जाता है और सब कुछ पहले की भांति हो जाता है। हिमालयी क्षेत्र में आपदाओं से निपटने के लिए एक बहुआयामी रणनीति की ज़रूरत है, जिसमें वैज्ञानिक शोध, नीति-निर्माण, क्रियान्वयन तंत्र, जन-जागरूकता और समुदाय की भागीदारी शामिल हो।
भारत में, नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर ने रिमोट सेंसिंग तस्वीरों का इस्तेमाल करके भारतीय हिमालयी क्षेत्र में कुल मिलाकर लगभग 28,000 ग्लेशियल झीलों में से ज़्यादा जोखिम वाली 7,500 ग्लेशियल झीलों की मैपिंग की है। साथ ही, खतरनाक हो सकने वाली ग्लेशियल झीलों से बनने वाली बाढ़ की संभावना भी तैयार की है। इसमें बाढ़ का खतरा और अगर ये झीलें कभी टूटती हैं, तो नीचे बसे इलाकों तक बाढ़ की लहरें पहुंचने में लगने वाले संभावित समय का ब्योरा भी दिया गया है।
वैज्ञानिक डेटा विश्लेषण से और कार्रवाई न करने के गंभीर नतीजों के बारे में चेतावनी देकर अपना काम कर रहे हैं, लेकिन नीति निर्माता, राजनेता और प्रशासन की प्रतिक्रिया धीमी, बिखरी हुई या उदासीन भी रही है। क्षेत्रीय स्तर पर, हिमालयी क्षेत्र के देशों के बीच सहयोग लगभग न के बराबर है। जबकि इन देशों को साथ मिलकर काम करना चाहिए, क्योंकि जलवायु और पर्यावरण से जुड़ी आपदाएं राजनीतिक सीमाओं को नहीं मानती, जैसा कि नेपाल की त्रासदी से पता चला है। सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेकांग जैसी बड़ी नदियां हिमालय से निकलती हैं और कई देशों से होकर गुजरती हैं। उदाहरणार्थ, एक देश में भूस्खलन से दूसरे देश में प्रलयकारी बाढ़ आ सकती है। कम से कम और कुछ नहीं तो डेटा और जानकारी साझा की जानी चाहिए, तत्पश्चात संयुक्त निगरानी और वैज्ञानिक सहयोग किया जाना चाहिए।




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