सरकारी स्कूलों की बदहाली

 इलमा अज़ीम 

सरकारी विद्यालय वंचित, किसान, मजदूर और गरीब परिवारों के बच्चों के लिए बेहतर भविष्य का साधन हैं। अनेक विद्यालयों में शौचालय, पेयजल, बैठने की व्यवस्था और पर्याप्त अध्यापकों का अभाव है। इन समस्याओं को लेकर जनजागरण और आंदोलन होना सकारात्मक संकेत है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों में शिक्षा अनिवार्य क्यों नहीं की जाती। यदि ऐसा हो जाए तो व्यवस्थागत सुधार स्वतःप्रारंभ हो सकते हैं।



 सरकारों को राजनीति से ऊपर उठकर शिक्षा व्यवस्था को प्राथमिकता देनी चाहिए, तभी विद्यालयों की वास्तविक स्थिति सुधरेगी। इनकी बदहाली केवल शिक्षा विभाग की नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की भी चुनौती है। पर्याप्त बजट के बावजूद अनेक विद्यालय भवन, शौचालय, पेयजल, बिजली, फर्नीचर और शिक्षकों जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। आवश्यक है कि आवंटित धन का पारदर्शी उपयोग हो, भ्रष्टाचार और लापरवाही पर जवाबदेही तय की जाए तथा शिक्षा की गुणवत्ता और बच्चों के सीखने के स्तर पर विशेष ध्यान दिया जाए। मजबूत सरकारी विद्यालय ही समान अवसर और समावेशी शिक्षा के सपने को साकार कर सकते हैं। 

देश में शिक्षा के बढ़ते निजीकरण के बीच अनेक सरकारी स्कूल आज भी बुनियादी सुविधाओं और आधुनिक तकनीक से वंचित हैं। कहीं विज्ञान प्रयोगशालाओं का अभाव है तो कहीं बच्चों के बैठने तक की समुचित व्यवस्था नहीं। बार-बार होने वाले अवकाश और शैक्षणिक अनुशासन की कमी भी लोगों का भरोसा कम करती है। सरकारी विद्यालयों की स्थिति सुधारने के लिए व्यवस्था में जवाबदेही आवश्यक है। सरकारी स्कूलों की बदहाली दूर करने के लिए राजनीति से ऊपर उठकर सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं। देश के अनेक विद्यालय आज भी शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। 



शासन, प्रशासन और समाज को मिलकर शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाना होगा। विद्यालयों में पर्याप्त स्थान और प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध हैं, आवश्यकता केवल सही दिशा में कार्य करने की है। अध्यापकों से गैर-शैक्षणिक कार्य कम लेकर उन्हें शिक्षण पर केंद्रित किया जाए। यदि ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ सुधारात्मक कदम उठाए जाएं तो सरकारी विद्यालयों की स्थिति में उल्लेखनीय परिवर्तन लाया जा सकता है।

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