200 साल बाद घर में गूंजी बेटी की किलकारी, परिवार ने रथ में बिठाकर किया गार्गी का भव्य स्वागत

चार पीढ़ियों में पहली बार बेटी के जन्म पर दहीफले परिवार में जश्न, ढोल-नगाड़ों के साथ अस्पताल से रथ में घर पहुंची मां-बेटी

बीड (महाराष्ट्र), 2 सितंबर 2026। महाराष्ट्र के बीड जिले में एक परिवार में बेटी के जन्म की खुशी ने पूरे इलाके का ध्यान खींचा है। दहीफले परिवार का दावा है कि करीब 200 वर्षों और चार पीढ़ियों में पहली बार उनके घर बेटी का जन्म हुआ है। परिवार ने इस खुशी को यादगार बनाने के लिए बच्ची और उसकी मां का अस्पताल से रथ में भव्य स्वागत करते हुए घर तक जुलूस निकाला। इस दौरान ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच परिवार के लोग खुशी से झूमते नजर आए।

बच्ची का नाम गार्गी रखा गया है। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद परिवार ने पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार मां और बेटी को सजे हुए रथ में बैठाया। इसके बाद जुलूस के रूप में दोनों को घर लाया गया। रास्तेभर परिवार और परिचितों में उत्साह का माहौल रहा।

दादा बोले- बेटी का होना सौभाग्य

परिवार के अनुसार, लंबे समय से घर में बेटी का जन्म नहीं हुआ था। बच्ची के दादा ने कहा कि परिवार में बेटी का होना उनके लिए बेहद सौभाग्य की बात है। उन्होंने कहा कि इतने वर्षों से परिवार को बेटी न होने का अफसोस था और अब यह इच्छा पूरी हुई है।

गार्गी की दादी सुरेखा दहीफले ने बच्ची को घर की ‘लक्ष्मी’ बताया। उनके लिए गार्गी का जन्म केवल परिवार में नए सदस्य के आने की खुशी नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही एक कमी के पूरा होने का अवसर भी है।

पिता बोले- फूल की तरह पालेंगे

बच्ची के पिता ने कहा कि अस्पताल में ही परिवार ने तय कर लिया था कि बेटी का घर में भव्य स्वागत किया जाएगा। उन्होंने कहा कि बेटियां अक्सर अपने पिता के बेहद करीब होती हैं और वे गार्गी को फूल की तरह पालेंगे।

उन्होंने कहा कि आमतौर पर समाज में बेटे की चाहत देखने को मिलती है, लेकिन बेटी के जन्म का एहसास बिल्कुल अलग है। परिवार ने बेटी के जन्म को पूरे उत्साह और सम्मान के साथ मनाकर यह संदेश देने की कोशिश की कि बेटियां भी परिवार की खुशियों का केंद्र बन सकती हैं।

पिपलांत्री की अनूठी परंपरा का भी जिक्र

बेटी के जन्म पर जश्न मनाने की मिसाल राजस्थान के पिपलांत्री गांव में भी देखने को मिली है। वहां हर बेटी के जन्म पर 111 पौधे लगाने की परंपरा है। यह पहल गांव के पूर्व सरपंच श्याम सुंदर पालीवाल ने अपनी बेटी के निधन के बाद शुरू की थी।

समय के साथ यह परंपरा बेटी के जन्म को बोझ मानने वाली सोच के खिलाफ एक सकारात्मक संदेश के रूप में चर्चित हुई। दहीफले परिवार द्वारा बेटी के जन्म पर किया गया यह भव्य स्वागत भी इसी तरह बेटी के प्रति सकारात्मक सोच और सम्मान का संदेश देता नजर आया।

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