सुभाष चंद्रा और मुकेश अंबानी आमने-सामने: NCLT कर्ज मामले पर छिड़ी जुबानी जंग, रिलायंस ने आरोपों को बताया बेबुनियाद
एस्सेल ग्रुप चेयरमैन का आरोप- रिलायंस के मीडिया संस्थानों ने कर्ज निपटारे को लेकर फैलाया गलत नैरेटिव; रिलायंस बोला- मीडिया का इस्तेमाल किसी को निशाना बनाने के लिए नहीं
नई दिल्ली। एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा और रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी के बीच कर्ज निपटारे से जुड़े मामले को लेकर जुबानी जंग तेज हो गई है। डॉ. सुभाष चंद्रा ने रिलायंस से जुड़े मीडिया संस्थानों पर उनके खिलाफ भ्रामक खबरें और गलत नैरेटिव चलाने का आरोप लगाया है। वहीं, रिलायंस ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए इन्हें बेबुनियाद और तथ्यहीन बताया है।
डॉ. सुभाष चंद्रा ने एक इंटरव्यू में आरोप लगाया कि टीवी18 और सीएनबीसी समेत रिलायंस से जुड़े मीडिया प्लेटफॉर्म उनके व्यक्तिगत कर्ज और नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की कार्यवाही को लेकर गलत जानकारी प्रसारित कर रहे हैं। उनके मुताबिक, करीब 22 हजार करोड़ रुपये के दावे के मुकाबले 6.5 करोड़ रुपये में कर्ज निपटाने की खबर को गलत तरीके से पेश किया गया है।
अंबानी को पत्र लिखने का दावा
डॉ. चंद्रा ने दावा किया कि उन्होंने मामले को लेकर मुकेश अंबानी से संपर्क करने की कोशिश की। जवाब नहीं मिलने पर उन्होंने अंबानी को पत्र लिखकर रिलायंस से जुड़े मीडिया संस्थानों में उनके खिलाफ कथित अभियान रोकने की अपील भी की।
उन्होंने कहा कि किसी भी कारोबारी या व्यक्ति से जुड़ी खबर प्रसारित करने से पहले मीडिया संस्थानों को संबंधित पक्ष का पक्ष जानना चाहिए और तथ्यों की पूरी तरह पुष्टि करनी चाहिए।
2019 के विवाद का भी किया जिक्र
डॉ. चंद्रा ने अपने आरोपों को मौजूदा विवाद तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने 2019 में जी के शेयर भाव में आई तेज गिरावट और इसके बाद इनवेस्को के साथ मिलकर जी के अधिग्रहण की कथित कोशिश का भी जिक्र किया। उनका दावा है कि प्रस्ताव अल्पांश शेयरधारकों के हित में नहीं था और इसलिए आगे नहीं बढ़ सका।
बोले- अब खोने के लिए ज्यादा कुछ नहीं
डॉ. चंद्रा ने अपने ऊपर लंबे समय से चल रहे आर्थिक दबाव और संपत्तियों की बिक्री का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इन परिस्थितियों के बाद अब उनके पास खोने के लिए ज्यादा कुछ नहीं बचा है। साथ ही उन्होंने संकेत दिया कि उनके खिलाफ कथित अभियान जारी रहा तो वह अपना बचाव करने के लिए हर संभव कदम उठाएंगे।
रिलायंस ने आरोपों को किया खारिज
डॉ. चंद्रा के आरोपों पर रिलायंस की ओर से प्रतिक्रिया भी सामने आई। रिलायंस के प्रवक्ता ने इन आरोपों को बेबुनियाद और तथ्यहीन बताया। प्रवक्ता के मुताबिक, रिलायंस ग्रुप से जुड़े मीडिया संस्थानों का इस्तेमाल किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाने के लिए नहीं किया गया है और न ही भविष्य में ऐसा किया जाएगा।
रिलायंस ने डॉ. सुभाष चंद्रा को एक बड़े कारोबारी और उद्यमी के तौर पर सम्मान देने की बात भी कही।
क्या है 22 हजार करोड़ रुपये का मामला?
विवाद की जड़ डॉ. सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत गारंटी से जुड़े दिवालिया प्रक्रिया के मामले में है। मामला विवेक इंफ्राकॉन द्वारा लिए गए करीब 170 करोड़ रुपये के कर्ज से जुड़ा है। इस कर्ज के लिए डॉ. चंद्रा ने व्यक्तिगत गारंटी दी थी। कर्ज की अदायगी नहीं होने के बाद इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस ने उनके खिलाफ IBC के तहत कार्रवाई शुरू की।
बाद में अन्य लेनदार भी इस प्रक्रिया में शामिल हुए और कुल दावे की राशि करीब 22 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
डॉ. चंद्रा की ओर से पेश किए गए पुनर्भुगतान प्रस्ताव के तहत व्यक्तिगत तौर पर करीब 6.5 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाना है। लेनदारों के बीच मतदान में 80.8 प्रतिशत से अधिक वोटिंग अधिकार रखने वाले लेनदारों ने प्रस्ताव का समर्थन किया।
LIC Housing Finance ने जताया था ऐतराज
LIC Housing Finance समेत कुछ लेनदारों ने प्रस्ताव पर आपत्ति जताई थी। LIC Housing Finance ने करीब 1,322.39 करोड़ रुपये का दावा किया था, जबकि प्रस्ताव के तहत उसे लगभग 38.09 लाख रुपये मिलने थे। इसी बेहद कम रिकवरी को लेकर लेनदारों ने सवाल उठाए थे।
मामले में अलग-अलग राय सामने आने के बाद तीसरे सदस्य के रूप में न्यायिक सदस्य नीलेश शर्मा को शामिल किया गया। उन्होंने डॉ. चंद्रा के पुनर्भुगतान प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए लेनदारों की आपत्तियों को खारिज कर दिया।
NCLT के फैसले का क्या मतलब?
मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डॉ. चंद्रा के खिलाफ व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया में प्रस्तावित 6.5 करोड़ रुपये की रिकवरी को उनके व्यक्तिगत गारंटर के रूप में दायित्व से जोड़कर देखा जा रहा है। NCLT के मुताबिक, प्रस्ताव मंजूर होने के बाद लेनदारों के पास मूल कर्जदारों से अपनी बकाया राशि की वसूली का रास्ता खुला रह सकता है।
यानी 6.5 करोड़ रुपये का भुगतान पूरे 22 हजार करोड़ रुपये के कर्ज का निपटारा नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि यह व्यक्तिगत गारंटी से जुड़ी दिवालिया प्रक्रिया के तहत प्रस्तावित भुगतान है।
फिलहाल सुभाष चंद्रा के आरोपों और रिलायंस की प्रतिक्रिया ने दोनों बड़े कारोबारी समूहों के बीच पुराने कारोबारी विवादों को फिर चर्चा में ला दिया है। हालांकि, दोनों पक्षों के दावों के बीच मामले की वास्तविक स्थिति समझने के लिए NCLT के आदेश और संबंधित कानूनी दस्तावेजों को आधार बनाना महत्वपूर्ण होगा।


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