हिमालय की चेतावनी
इलमा अज़ीम
नेपाल में हाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने पूरे हिमालयी क्षेत्र के सामने एक गंभीर और असहज सवाल खड़ा कर दिया है- क्या हम हिमालय की प्राकृतिक क्षमता से कहीं अधिक छेड़छाड़ तो नहीं कर रहे? आरंभिक तौर पर इसे बादल फटने से जुड़ी घटना माना गया, लेकिन बाद के वैज्ञानिक अध्ययन और उपग्रह चित्रों से संकेत मिला कि ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र में हिम और चट्टान का बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे गिरा और उसके साथ भारी मात्रा में मलबा नदी में आ गया। नेपाल की इस त्रासदी को केवल एक प्राकृतिक आपदा मानकर भूल जाना उचित नहीं होगा।
हिमालय में आपदा को केवल उस स्थान तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता जहां से वह शुरू होती है। ऊपर पहाड़ में होने वाली एक घटना नीचे बसे हजारों लोगों के लिए कुछ ही समय में जीवन-मरण का प्रश्न बन सकती है। यही चिंता हमें पिछले वर्ष उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली की घटना की ओर भी ले जाती है। 5 अगस्त 2025 को धराली क्षेत्र में अचानक आई भीषण बाढ़ और मलबे ने कुछ ही समय में घरों, दुकानों, सडक़ों और दूसरी संरचनाओं को अपनी चपेट में ले लिया था।
धराली और नेपाल की घटनाएं बिल्कुल एक जैसी नहीं थीं और दोनों के तत्काल कारणों में अंतर हो सकता है, लेकिन दोनों घटनाएं एक समान चेतावनी अवश्य देती हैं। वह चेतावनी यह है कि हिमालय में हमारी आधारभूत संरचनाओं की योजना अभी भी उस पुराने हिमालय को ध्यान में रखकर बनाई जा रही है, जबकि पहाड़ की भौगोलिक और जलवायवीय परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। हिमालय में सबसे बड़ा परिवर्तन हिमनदों और बर्फ की दुनिया में हो रहा है।
बढ़ते तापमान के कारण हिमनद पीछे हट रहे हैं और बर्फ के पिघलने की गति बढ़ रही है। इससे ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता, नदी के प्रवाह और ढलानों की स्थिरता पर असर पड़ रहा है। अनेक स्थानों पर हिमनद झीलों का विस्तार हो रहा है। यदि ऐसी झीलों का प्राकृतिक अवरोध अचानक टूट जाए तो नीचे की ओर आने वाला पानी सामान्य बाढ़ नहीं होता।
वह अपने साथ चट्टान, मिट्टी, बर्फ और मलबा लेकर आता है और उसका विनाशकारी प्रभाव कई किलोमीटर तक फैल सकता है। यहां सावधानी आवश्यक है। हर बाढ़ का कारण जलवायु परिवर्तन नहीं होता और हर बादल फटने की घटना को बढ़ते तापमान से जोड़ देना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। इसलिए भविष्य की आपदाओं को केवल पुराने अनुभवों के आधार पर समझना अब पर्याप्त नहीं होगा।





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