.तो मशीनें हमारी भाषा भी छीन लेंगी?
- रविकान्त राऊत
यदि आज से बीस वर्ष पहले कोई आपसे कहता कि आप जापान के किसी व्यक्ति से उसकी भाषा जाने बिना सहज बातचीत कर सकेंगे, जर्मन भाषा में लिखे शोध-पत्र को कुछ सेकंड में हिंदी में पढ़ सकेंगे, या दुनिया के किसी भी देश का समाचार अपनी मातृभाषा में तुरंत समझ पाएँगे, तो शायद आप इसे विज्ञान-कथा मानते। लेकिन आज यह हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका है।
हम अक्सर गूगल ट्रांसलेट या चैटजीपीटी जैसे उपकरणों का उपयोग तो करते हैं, पर शायद ही कभी यह सोचते हैं कि इनके पीछे सात दशकों से अधिक लंबे वैज्ञानिक विकास की कहानी छिपी है। यह कहानी केवल मशीनों की नहीं, बल्कि मानव भाषा, संस्कृति और बुद्धिमत्ता को समझने की निरंतर कोशिश की भी है।
अनुवाद तकनीक की यात्रा 1950 के दशक में शुरू हुई। उस समय कंप्यूटरों को कुछ निश्चित व्याकरणिक नियम और शब्दकोश दिए जाते थे। मशीन उन्हीं नियमों के आधार पर एक भाषा को दूसरी भाषा में बदलने का प्रयास करती थी। परिणाम अक्सर हास्यास्पद होते थे। वाक्य व्याकरण की दृष्टि से टूटे-फूटे होते और उनका अर्थ कई बार पूरी तरह बदल जाता। लेकिन वही असफल प्रयास आगे की सफलता की पहली सीढ़ी बने।
फिर आया आँकड़ों और स्टैटिस्टिक का युग। वैज्ञानिकों ने लाखों द्विभाषी दस्तावेज़ कंप्यूटरों को पढ़ाए। मशीन ने यह सीखना शुरू किया कि किसी भाषा के शब्द दूसरी भाषा में सामान्यतः किस प्रकार अनूदित होते हैं। इससे गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार आया, लेकिन मशीन अब भी केवल शब्दों और उनके मेल को समझती थी, अर्थ को नहीं।
वास्तविक परिवर्तन तब आया जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता और न्यूरल नेटवर्क विकसित हुए। अब मशीनें केवल शब्दों का नहीं, पूरे वाक्य का संदर्भ समझने लगीं। यही तकनीक आजन्यूरल मशीन ट्रांसलेशनकहलाती है। गूगल ट्रंस्लेट औत डीप-एलऔर अन्य आधुनिक अनुवाद प्रणालियाँ इसी आधार पर काम करती हैं। यही कारण है कि आज का अनुवाद पहले की तुलना में कहीं अधिक स्वाभाविक और सहज लगता है।
मान लीजिए किसी कविता की पंक्ति है—"उसकी आँखों में सावन उतर आया।" मशीन इसे किसी दूसरी भाषा में शब्दशः बदल सकती है, लेकिन क्या वह उस भाव, उस सांस्कृतिक संकेत और उस संवेदना को भी साथ ले जा पाएगी? शायद नहीं। भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं होती; उसमें इतिहास, संस्कृति, लोकस्मृतियाँ, मुहावरे, व्यंग्य, हास्य और भावनाएँ भी समाहित होती हैं। इन्हें समझना अभी भी मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत है।
यही कारण है कि कानूनी दस्तावेज़, चिकित्सा साहित्य, साहित्यिक कृतियाँ, विज्ञापन और कूटनीतिक संवाद आज भी मानव अनुवादकों की विशेषज्ञता पर निर्भर हैं। मशीन गति देती है, लेकिन अंतिम विश्वसनीयता अभी भी मनुष्य सुनिश्चित करता है।
भविष्य की सबसे दिलचस्प बात यह है कि विशेषज्ञ अब मशीन और मनुष्य को प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि सहयोगी मान रहे हैं। नई कार्यप्रणाली में मशीन पहले मसौदा तैयार करती है और मानव अनुवादक उसे सुधारकर भाषा को स्वाभाविक, सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त और प्रभावशाली बनाता है। इसेमशीन ट्रांसलेशन पोस्ट एडिटिंग (MTPE)कहा जाता है। सरल शब्दों में कहें तो मशीन मेहनत करती है, लेकिन भाषा में प्राण मनुष्य ही फूँकता है।
इस परिवर्तन ने एक नया उद्योग भी जन्म दिया है, ट्रांसलेशन मेंएज़मेंट सिस्टम (TMS)। ये ऐसे डिजिटल मंच हैं जो विशाल अनुवाद परियोजनाओं का प्रबंधन करते हैं। इनमें शब्दावली का मानकीकरण, गुणवत्ता जाँच, टीमों के बीच समन्वय, समय-सीमा का पालन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का एकीकृत उपयोगसब कुछ एक ही स्थान पर संभव हो जाता है। आज बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और तकनीकी उद्योग इन्हीं प्रणालियों पर निर्भर हैं।
इसी बीच एक और रोचक प्रतिस्पर्धा चल रही है। एक ओर गूगल और डीपएलजैसे प्लेटफ़ॉर्म हैं, जिन्होंने वर्षों तक केवल अनुवाद तकनीक को बेहतर बनाने पर काम किया। दूसरी ओर ओपनएआई जैसे संस्थान हैं, जिनका मुख्य लक्ष्य मानव जैसी स्वाभाविक भाषा उत्पन्न करना है। यही कारण है कि चैटजीपीटीकेवल अनुवाद नहीं करता, बल्कि भाषा को संदर्भ, शैली और उद्देश्य के अनुरूप भी ढाल सकता है। आने वाले वर्षों में यह प्रतिस्पर्धा और तीव्र होगी, और इसका लाभ अंततः उपयोगकर्ताओं को ही मिलेगा।
फिर भी एक प्रश्न हमारे सामने बना रहेगा कि क्या कभी मशीन मनुष्य की तरह भाषा को महसूस कर सकेगी?
संभव है कि आने वाले समय में हम दुनिया की हर भाषा कुछ ही क्षणों में समझ सकें। यह भी संभव है कि भाषा की दीवारें लगभग समाप्त हो जाएँ। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि किसी कविता की कसक, किसी माँ की लोरी की ऊष्मा, किसी प्रेमपत्र की धड़कन या किसी लोकगीत की आत्मा को पूरी तरह समझने के लिए अंततः एक संवेदनशील मनुष्य की ही आवश्यकता होगी।
शायद भविष्य का सबसे सटीक अनुवाद वही होगा, जिसमें मशीन की गति और मनुष्य की संवेदना, दोनों साथ चलें।
(जबलपुर, मध्यप्रदेश)






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