प्लास्टिक कूड़े की चुनौती
राजीव त्यागी
धरती पर निरंतर बढ़ता प्लास्टिक कचरा एक प्रमुख पर्यावरणीय समस्या बनकर उभर रहा है। देश में प्रतिवर्ष लगभग 94 लाख टन से लेकर 1.02 करोड़ टन तक प्लास्टिक वेस्ट पैदा होता है। धरती, समुद्र, पहाड़, नदियां -शायद ही कोई कोना प्लास्टिक कचरे की घुसपैठ से बचा हो! सड़कों, गलियों, नालियों में यत्र-तत्र फैंके गए प्लास्टिक के लिफ़ाफ़े अक्सर भूखे जानवरों के गले में फंसकर उनकी मौत तक को न्योता दे सकते हैं।
विकास तथा आधुनिकीकरण ने यदि वैश्विक स्तर पर प्लास्टिक के निर्माण तथा उपभोग में भारी वृद्धि की, तो इसमें मुख्य वज़ह इसकी बहुउपयोगिता, टिकाऊपन तथा अपेक्षाकृत कम लागत होना है। हालांकि, अविश्वसनीय रूप से लंबे समय तक बने रहने की यही विशेषता पर्यावरण की सेहत के लिहाज़ से हानिप्रद साबित होती है। प्लास्टिक के न सड़ने तथा वर्षों तक ज़मीन के अंदर कायम रहने से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है।
प्लास्टिक बैग नालियां, सीवेज सिस्टम आदि ब्लॉक करके अस्वच्छता बढ़ाने के साथ बीमारियां फैलाने की वजह बनते हैं। प्लास्टिक कचरे का समुचित निस्तारण न हो पाना प्रमुख चुनौती है। देश में रोज़ाना निकलने वाले लगभग 26,000 टन प्लास्टिक कचरे में से क़रीब 60 प्रतिशत कचरे का ही पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) हो पाता है, शेष हिस्सा पर्यावरण अथवा लैंडफिल में बना रहता है।
इसका अनुचित निपटान पर्यावरण प्रदूषण, जैव विविधता की हानि तथा पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण का व्यापक कारण बनता है। पृथ्वी हमारा घर है और इसे प्रदूषित होने से रोकना हम पृथ्वीवासियों की सर्वोपरि ज़िम्मेदारी।





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