राजीव त्यागी
कुछ ही दिन पहले राजधानी दिल्ली में युवा आक्रोश का एक नमूना देखा था देश ने। युवाओं की ‘कॉकरोच पार्टी’ ने शिक्षा मंत्री का इस्तीफा दिलवाकर ही दम लिया था। फिर ऐसा ही आक्रोश झारखंड की राजधानी में पहुंचा। लेकिन, समस्या मात्र एक विवाद की नहीं है। कहीं अधिक गंभीर है मामला—समस्या युवाओं के आंदोलनी तेवरों के कारण समझने की है। युवाओं की हताशा और आक्रोश को समझने की आवश्यकता है। यह अनायास ही नहीं हुआ कि देश में सब तरफ युवा-आक्रोश की बात होने लगी है।
एक अर्से से यह गुस्सा भीतर ही भीतर पनप रहा था। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने देश के युवाओं की तुलना तिलचट्टों (कॉकरोचों) से करके देश के युवाओं की पीड़ा को अभिव्यक्ति बना दिया। सच बात तो यह है कि हमारी ‘जेन जी’ पीढ़ी सोच और व्यवहार दोनों को नई दिशा देने वाली है। आवश्यकता उसकी आलोचना करने की नहीं, उसे परजीवी मानने की नहीं, उसे समझने की है। यह पीढ़ी जो है, जैसी है, उसकी भर्त्सना करने से बात नहीं बनेगी, बात तब बनेगी जब हम उसके सोच की अनगढ़ता के बजाय उसके भीतर की सकारात्मकता को जानने-समझने की कोशिश करें। कब करेंगे हम यह कोशिश, यह हमें सोचना है। यह सही है कि इस सारे प्रकरण की शुरुआत नीट जैसी और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में हुई धांधली का कारण बनी।
यह भी सही है कि यह धांधली अपने आप में कोई छोटी समस्या नहीं है। पर देश का युवा जिस समस्या से जूझ रहा है वह कहीं अधिक जटिल और गहरी है। हताश है देश का युवा। वह जब नीट जैसी परीक्षाओं में बैठता है तो उसकी आंखों में एक सुनहरे भविष्य का सपना होता है। बहुत पीड़ा होती है जब ऐसा कोई सपना टूटता है। और यह पीड़ा तब और गहरी हो जाती है जब वह यह पाता है कि इसमें उसका कोई दोष नहीं है। कुछ ग़लत तत्व, कोई ग़लत व्यवस्था और कुछ ग़लत नीतियां उसके भविष्य के साथ खिलवाड़ करने के लिए जिम्मेदार हैं। वह समझ नहीं पाता कि उसका अवसर की समानता का अधिकार कोई कैसे छीन लेता है; सारी ज़रूरी योग्यताओं के बावजूद वह बेकारी से पीछा क्यों नहीं छुड़ा पाता? हां, बेकारी एक बड़ा कारण है हमारे देश के युवाओं की पीड़ा और आक्रोश का।
सरकार भले ही कैसे और कितने ही दावे करती रहे अच्छे दिनों के, पर देश के युवा पथराई आंखों से इंतजार कर रहे हैं उन दिनों और उन स्थितियों का जब उनके दिन अच्छे होंगे। हकीकत यह है कि 15 से 24 आयु वर्ग के हमारे युवा आज एक गंभीर आर्थिक-सामाजिक चुनौती बन गए हैं। हमारे पास युवाओं की सबसे बड़ी आबादी है। यह संख्या हमारी ताकत होनी चाहिए थी, पर दुर्भाग्य से आज यह अपने आप में एक समस्या है। बेरोजगारी, गरीबी और बढ़ती जनसंख्या के मेल ने हमारे युवाओं की समस्याओं को बढ़ा दिया है।
इन तीनों के कारण देश के युवाओं को सही और उचित काम नहीं मिलता, उनकी बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं होतीं। उनकी निराशा धीरे-धीरे हताशा में बदलती जाती है। इस स्थिति के जो भी परिणाम हो सकते हैं, वे हमारे सामने हैं। ऐसे में युवाओं पर उंगली उठाना या फिर उन्हें कॉकरोच, परजीवी अथवा राष्ट्र-विरोधी आदि कहना किसी तरह से उचित नहीं है। हमारे राजनेताओं को इस बात को साफतौर समझना होगा कि आज की पीढ़ी आदेश मानने के बजाय तार्किक जवाब चाहती है।





No comments:
Post a Comment