व्यवस्था की भूलभुलैया में उलझा न्याय


- रविकांत राऊत

सदियों से न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी बंधी होने का रूपक दिया जाता है, ताकि वह हर प्रभाव से मुक्त रहकर निष्पक्ष न्याय कर सके। लेकिन जब सत्ता, रसूख और राजनीतिक बाहुबल का भारी वजन तराजू के एक पलड़े पर रख दिया जाता है, तो क्या वह पट्टी न्याय को अंधा कर देती है? हाल ही में दिल्ली की एक अदालत ने चर्चित महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न मामले में पूर्व कुश्ती महासंघ प्रमुख को बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि शिकायतकर्ताओं के बयानों में विरोधाभास थे। यह फैसला जंतर-मंतर पर हुए उस ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन के लिए एक बड़ा झटका है जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा था। यह घटनाक्रम हमें रुककर यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या तकनीकी रूप से सही दिखने वाला कानूनी फैसला, मानवीय और सामाजिक न्याय की कसौटी पर भी खरा उतरता है?

यह फैसला केवल एक व्यक्ति की रिहाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है: जब शक्तिशाली राजनेताओं का सामना व्यवस्था से होता है, तो क्या हमारी मौजूदा आपराधिक न्याय प्रणाली उस 'शक्ति-असंतुलन' को समझने और पीड़ितों को निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करने में सक्षम है?  पदक जीतने पर जिन खिलाड़ियों को 'देश की बेटियां' कहलाने का गौरव प्राप्त होता है, उन्हें अपने सम्मान की रक्षा के लिए सड़कों पर क्यों उतरना पड़ता है?  यह पूरा घटनाक्रम खेल संघों में राजनीतिक हस्तक्षेप के लंबे इतिहास और व्यवस्था की प्रारंभिक उदासीनता का एक जीवंत दस्तावेज बन गया है।
इस मामले का संस्थागत विश्लेषण करने पर कई कड़वी सच्चाइयां सामने आती हैं। यौन उत्पीड़न के मामले अक्सर बंद कमरों में या एकांत में होते हैं।ऐसे में वर्षों बाद कानूनी प्रक्रिया के दौरान सटीक सबूत या बिना किसी विरोधाभास वाले बयान देना मानवीय रूप से कितना मुश्किल है, इसे समझा जाना चाहिए। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े लगातार यह दर्शाते हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों, विशेषकर कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (धारा 354ए), में दोषसिद्धि की दर काफी कम रहती है।इसका एक बड़ा कारण गवाहों का मुकरना या साक्ष्यों का अभाव होता है।इसके अतिरिक्त, 2023 की कई प्रतिष्ठित मीडिया रिपोर्ट्स (जैसे द इंडियन एक्सप्रेस) और स्वयं खेल मंत्रालय की समितियों ने यह उजागर किया था कि भारत के कई राष्ट्रीय खेल महासंघों में यौन उत्पीड़न रोकथाम अधिनियम  के तहत अनिवार्य 'आंतरिक शिकायत समिति' या तो थी ही नहीं, या फिर वे नियमानुसार गठित नहीं थीं। कुश्ती जैसे खेलों का पितृसत्तात्मक ढांचा महासंघ प्रमुख को इतनी असीमित शक्ति दे देता है कि वह किसी भी खिलाड़ी के पूरे करियर को खत्म कर सकता है।

हालांकि, इस विमर्श में न्यायपालिका के दृष्टिकोण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली "संदेह से परे अपराध सिद्ध होने" के स्थापित सिद्धांत पर काम करती है। अदालतें जनभावना, मीडिया ट्रायल या जंतर-मंतर की भीड़ से नहीं, बल्कि ठोस साक्ष्यों और गवाहियों के आधार पर चलती हैं। यदि बयानों में विरोधाभास है, तो कानून तकनीकी रूप से आरोपी को बरी करने के लिए बाध्य है। अदालतों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे केवल भावनाओं के आधार पर सजा मुकर्रर कर दें।

लेकिन यहीं पर न्याय प्रणाली की सीमाएं और सत्ता का मनोविज्ञान आपस में टकराते हैं। अदालतों में बचाव पक्ष द्वारा अक्सर 'डिले इन एफआईआर' को आधार बनाया जाता है। परंतु खेल जैसे करियर में जहां चयन समिति से लेकर फंड तक एक ही व्यक्ति के हाथ में हो, वहां एथलीट के लिए तुरंत आवाज़ उठाना कितना कठिन है, इस शक्ति असंतुलन को व्यवस्था अक्सर नजरअंदाज कर देती है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और पीड़ित को अपने करियर और सम्मान के बीच किसी एक को चुनना पड़े, तो न्याय की उम्मीद धुंधली पड़ जाती है।
इस व्यवस्थागत विफलता से बाहर निकलने के लिए हमें त्वरित और ठोस कदम उठाने होंगे।सबसे पहले, सभी खेल संघों में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकथाम अधिनियम, 2013 का सख्ती से कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।खेल प्रशासकों की नियुक्ति में राजनेताओं के बजाय पूर्व खिलाड़ियों (विशेषकर महिलाओं) की भागीदारी बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है ताकि खेल का माहौल संवेदनशील और पारदर्शी बन सके।इसके अलावा, खेलों के लिए एक स्वतंत्र और निष्पक्ष ट्रिब्यूनल का गठन किया जाना चाहिए, ताकि खिलाड़ियों को न्याय के लिए सिविल अदालतों के लंबे चक्रव्यूह में न फंसना पड़े।
अंततः, यह समझना आवश्यक है कि "अदालत से बरी होना और निर्दोष होना, ये दोनों हमेशा एक ही बात नहीं होते"।यह फैसला भले ही कानूनी रूप से सही ठहराया जाए, लेकिन समाज और खेल व्यवस्था के माथे पर यह एक ऐसा सवाल छोड़ गया है जिसका जवाब पदकों की चमक से नहीं ढंका जा सकता। जब तक देश की कोई भी बेटी खेल के मैदान में उतरने से पहले प्रशासनिक ढांचे से असुरक्षित महसूस करती है, तब तक कोई भी कानूनी फैसला पूर्ण न्याय का दावा नहीं कर सकता। व्यवस्था को यह सुनिश्चित करना ही होगा कि न्याय केवल अंधा न हो, बल्कि वह सत्ता के वजन को भी महसूस करने में सक्षम हो।
(जबलपुर, मध्यप्रदेश)

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