मां ने किडनी देकर बचाई जिंदगी, अब भोले की भक्ति में पैदल निकले रविशंकर; हरिद्वार से पुरा महादेव तक कांवड़ यात्रा

मेरठ। मां ने अपनी किडनी देकर बेटे को नई जिंदगी दी और अब वही बेटा शिवभक्ति में ऐसा संकल्प लेकर निकला है, जिसने हर किसी का दिल छू लिया। रोहटा निवासी 30 वर्षीय रविशंकर वर्ष 2022 में किडनी ट्रांसप्लांट के बाद पूरी तरह स्वस्थ हुए। अब वह हरिद्वार से गंगाजल लेकर सैकड़ों किलोमीटर की पैदल कांवड़ यात्रा पर निकले हैं।

रविशंकर का लक्ष्य पुरा महादेव मंदिर पहुंचकर भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करना है। उनकी यह यात्रा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि बीमारी पर जीत और जिंदगी के प्रति उनके हौसले की कहानी भी है।

मां ने किडनी देकर दी नई जिंदगी

रविशंकर को किडनी की गंभीर बीमारी थी। वर्ष 2022 में उनकी हालत ऐसी हो गई कि गुर्दा प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ी। उस मुश्किल समय में उनकी मां कौशल्या ने अपनी एक किडनी बेटे को दान कर दी। मां की कुर्बानी और डॉक्टरों के प्रयास से रविशंकर को नया जीवन मिला।

न्यूटीमा अस्पताल में गुर्दा रोग विशेषज्ञ डॉ. संदीप गर्ग की देखरेख में उनका सफल ट्रांसप्लांट हुआ। इसके बाद धीरे-धीरे रविशंकर ने सामान्य जिंदगी की ओर वापसी की।

2017 में शुरू हुआ था कांवड़ का संकल्प

रविशंकर पहले भी वर्ष 2017 में कांवड़ यात्रा कर चुके हैं। उन्होंने जोड़े की कांवड़ लाने का संकल्प लिया था, लेकिन यात्रा के बाद उनकी तबीयत गंभीर रूप से बिगड़ गई। बीमारी के कारण उनका संकल्प पूरा नहीं हो सका।

किडनी ट्रांसप्लांट के बाद जब उनकी सेहत सुधरी तो उन्होंने मन में फिर वही संकल्प दोहराया। इस बार उन्होंने हरिद्वार पहुंचकर गंगाजल उठाया और पैदल अपने घर की ओर यात्रा शुरू कर दी।

बीमारी को पीछे छोड़ भक्ति के रास्ते पर कदम

गुरुवार को रविशंकर हरिद्वार से कांवड़ लेकर पैदल रवाना हुए। उनके कदमों में शिवभक्ति है तो मन में वर्षों पुराना संकल्प पूरा करने का विश्वास। रास्ते की दूरी और थकान के बावजूद उनका हौसला कम नहीं हुआ।

रविशंकर की कहानी उन लोगों के लिए भी उम्मीद की किरण है, जो किडनी की बीमारी या ट्रांसप्लांट के बाद सामान्य जीवन को लेकर आशंकित रहते हैं।

डॉक्टर बोले- ट्रांसप्लांट के बाद सामान्य जीवन संभव

गुर्दा रोग विशेषज्ञ डॉ. संदीप गर्ग का कहना है कि किडनी फेल होना जिंदगी का अंत नहीं है। आधुनिक चिकित्सा ने किडनी ट्रांसप्लांट को काफी सफल बनाया है। सफल प्रत्यारोपण के बाद मरीज डॉक्टर की सलाह, नियमित दवाओं और सावधानियों का पालन करते हुए नौकरी, परिवार और रोजमर्रा की जिंदगी सामान्य रूप से जी सकता है।

उन्होंने कहा कि रविशंकर इसका उदाहरण हैं। बीमारी से जूझने के बाद आज वह न केवल स्वस्थ जीवन जी रहे हैं, बल्कि अपनी आस्था और संकल्प को पूरा करने के लिए पैदल कांवड़ यात्रा भी कर रहे हैं।

मां के त्याग से मिली जिंदगी और भोलेनाथ की भक्ति से मिला हौसला—रविशंकर की यह कांवड़ यात्रा आस्था, संघर्ष और जिंदगी की जीत की कहानी बन गई है।

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