हिमालय का तांडव: नेपाल की तबाही ने बजाई खतरे की घंटी

ग्लेशियरों के पिघलने से बढ़ रहा हिमनद झीलों और प्राकृतिक बांधों का खतरा, विकास की अंधी दौड़ पर उठे सवाल

राजीव त्यागी 

नेपाल में प्राकृतिक आपदा ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता और पर्यावरणीय संकट की भयावह तस्वीर सामने रख दी है। तिब्बत सीमा के पास ल्हेंदे नदी में पहाड़ का एक हिस्सा हिमखंड के साथ ढहने से नदी का करीब 20 किलोमीटर तक का बहाव बाधित हो गया। इससे वहां प्राकृतिक बांध बन गया। बाद में बांध टूटने पर हजारों क्यूसेक पानी बेहद तेज रफ्तार से भोटेकोशी नदी में पहुंचा और देखते ही देखते महाप्रलय जैसे हालात पैदा हो गए।

पानी का तेज बहाव रास्ते में आने वाले गांवों, मकानों, वाहनों, मवेशियों और लोगों को बहाता चला गया। त्रिशूली नदी में भी इसी तरह का प्रचंड बहाव पहुंचा, जिससे कई इलाकों में भारी तबाही हुई। सबसे भयावह बात यह रही कि पूरी घटना इतनी तेजी से हुई कि लोगों को संभलने और सुरक्षित स्थानों पर पहुंचने का मौका तक नहीं मिला।

सैकड़ों की मौत, कई अब भी लापता

आपदा में सैकड़ों लोगों की मौत की खबर है। मौत का आंकडा 800 को पार कर गया है।  जबकि बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता हैं। कई गांवों में मकान और संपत्तियां पूरी तरह तबाह हो गईं। प्रभावित इलाकों की व्यापकता को देखते हुए मृतकों और लापता लोगों की वास्तविक संख्या का आकलन करना अभी मुश्किल है।

ग्लोबल वार्मिंग से बढ़ रहा हिमालयी संकट

नेपाल की यह त्रासदी केवल एक प्राकृतिक दुर्घटना मानकर नजरअंदाज नहीं की जा सकती। हिमालयी क्षेत्र में लगातार बढ़ता तापमान ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की बड़ी वजह बन रहा है। ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं और कई क्षेत्रों में हिमनद झीलों का विस्तार हो रहा है। इनके प्राकृतिक बांध टूटने पर अचानक आने वाली बाढ़ नीचे बसे क्षेत्रों के लिए विनाशकारी साबित हो सकती है।

हिमालयी क्षेत्र में बढ़ता यह खतरा नेपाल और तिब्बत तक सीमित नहीं है। भारत के जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश तक इसका असर पहुंच सकता है। हिमालय से निकलने वाली नदियां करोड़ों लोगों के जीवन और आजीविका का आधार हैं।

विकास की कीमत कहीं बहुत भारी न पड़ जाए

हिमालय में सड़कें, सुरंगें और जलविद्युत परियोजनाएं बनाने के साथ पर्यटन गतिविधियों का तेजी से विस्तार हुआ है। पहाड़ों की कटाई और बड़े पैमाने पर निर्माण ने पर्यावरणविदों की चिंता भी बढ़ाई है। विशेषज्ञ लंबे समय से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों को वैज्ञानिक अध्ययन और पर्यावरणीय जोखिम के आधार पर नियंत्रित करने की जरूरत बताते रहे हैं।

विकास जरूरी है, लेकिन प्रकृति की कीमत पर होने वाला विकास भविष्य में विनाश का कारण बन सकता है। नेपाल की त्रासदी हिमालयी राज्यों और केंद्र सरकारों के लिए भी चेतावनी है कि ग्लेशियरों, नदियों और पहाड़ों के साथ बढ़ती मानवीय छेड़छाड़ को गंभीरता से लिया जाए।

हिमालय की चेतावनी साफ है—प्रकृति के संतुलन को लगातार चुनौती दी गई तो आपदा केवल नेपाल तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उसका असर पूरे हिमालयी क्षेत्र और मैदानी इलाकों तक पहुंच सकता है।

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