शिक्षा: भरोसे की जरूरत


राजीव त्यागी 

शिक्षा विकासशील भारत के लिए एक आधारभूत नींव है, जब यही नींव लड़खड़ाने लगे तो युवा शक्ति निराश होकर कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार हो जाती है। आज शिक्षा के मूलभूत ढांचे और पढ़ने-पढ़ाने और परीक्षा की व्यवस्था करने वाले लोगों की मनोवृत्ति में भी परिवर्तन करने की जरूरत है।  दरअसल, जल्दबाजी में सफलता प्राप्त करने वाली नई पीढ़ी नकल, गाइडों और ट्यूशनों के शार्टकट पर चल निकली। 

जरूरत इस शार्टकट को खत्म करके मेहनत, अध्ययन और अध्यवसाय को पुन: स्थापित करने की है। तब नौजवानों को उनकी योग्यता के अनुसार रोजगार की गारंटी अपने आप मिल जाएगी। इस सारी समस्या का समाधान एक ही है कि मनोवृत्तियों को बदला जाए और ईमानदारी, मेहनत और उसके प्रतिफल के भरोसे की पुनर्स्थापना देश में की जाए। सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था में भरोसा जगाना जरूरी है।

 दरअसल, युवाओं के लिये यह समय परीक्षाओं का समय होता है। उन्हें ऐसे समाधान देने पड़ते हैं जो उनके भरोसे और विश्वास का जीता-जागता प्रतीक बन सके । इसके लिए एक संवाद की जरूरत होती है। संवाद जो अभिभावक का अपनी संतान के साथ हो, अध्यापक का अपने छात्र के साथ हो और नेता से अपनी जनता के साथ हो। जब भरोसा ही खत्म होने लगे, आधारभूत नींव हिलती नजर आए और युवा संवादहीनता की स्थिति में पहुंच जाएं तब वही होता है जो इस समय दुर्भाग्य से अपने देश में हो रहा है।

समस्या शिक्षा व्यवस्था के ढांचे पैदा हो गई त्रुटियों के साल-दर-साल न सुधरने से पैदा हुई। पेपर लीक या नकल कोई ऐसी समस्या नहीं जो 2024 से शुरू हुई और अब 2026 में अपने भयावह रूप में हमारे सामने आई है, मानते हैं कि यह समस्या अलग-अलग समय में अलग-अलग राज्यों में पैदा होती रही और नौजवानों के सपनों को खंडित करती रही । लेकिन शिक्षा के व्यापक प्रसार उम्मीदों की ऊंचाई के बढ़ने के साथ-साथ जब एक देश एक परीक्षा का सिद्धांत बनाकर इसे अखिल भारतीय स्तर पर लागू करने का प्रयास किया गया तो ये त्रुटियां सही न हो पाने के कारण आज भस्मासुर सी लगने लगी हैं।

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