63 साल के दुर्गादास की 40 साल की साधना, दो बेटों और पोते के साथ फिर उठाई कांवड़

तीन पीढ़ियां एक साथ कर रहीं शिवभक्ति, 1984 में चाची के साथ शुरू किया था कांवड़ लाने का सिलसिला

मेरठ। कांवड़ यात्रा केवल आस्था और भक्ति का पर्व नहीं, बल्कि पीढ़ियों तक संस्कारों को पहुंचाने का माध्यम भी बन रही है। मेरठ के रजबन निवासी 63 वर्षीय दुर्गादास कन्नौजिया इसकी मिसाल हैं। वह इस बार अपने दो बेटों और 13 वर्षीय पोते के साथ हरिद्वार से कांवड़ लेकर मेरठ लौट रहे हैं। खास बात यह है कि दुर्गादास लगातार 40वीं बार कांवड़ ला रहे हैं।

रजबन में फुटबाल मैदान के पास रहने वाले दुर्गादास कन्नौजिया कैंट बोर्ड से सेवानिवृत्त हैं। उन्होंने वर्ष 1984 में पहली बार अपनी चाची सुंदर देवी के साथ कांवड़ यात्रा की थी। इसके बाद हर सावन में हरिद्वार से पवित्र गंगाजल लेकर मेरठ आने का सिलसिला जारी रहा। इस बार भी वह बुधवार शाम अपने बड़े बेटे पुनीत, छोटे बेटे सौरभ कन्नौजिया और 13 वर्षीय पौत्र दिशांत के साथ छोटा हाथी वाहन से हरिद्वार पहुंचे।

हरिद्वार से गंगाजल लेकर परिवार हर-हर महादेव और बोल बम के जयघोष के साथ मेरठ की ओर लौट रहा है। दुर्गादास के भतीजे शुभम कन्नौजिया ने बताया कि उनके बड़े बेटे पुनीत इस बार 20वीं बार पिता के साथ कांवड़ ला रहे हैं, जबकि पौत्र दिशांत दूसरी बार कांवड़ यात्रा में शामिल हुआ है।

तीन पीढ़ियों का साथ बना खास

परिवार अपने साथ खाने-पीने का सामान भी लेकर चलता है और कांवड़ मार्ग पर बने शिविरों में बहुत कम समय रुकता है। दुर्गादास ने बताया कि उनका पौत्र दिशांत भी बिना किसी परेशानी के पदयात्रा में शामिल हो रहा है। तीन पीढ़ियों के एक साथ कांवड़ लाने से वह बेहद खुश हैं। उनका कहना है कि भगवान शिव की भक्ति से जुड़े संस्कार अगली पीढ़ी तक पहुंचते देखना उनके लिए संतोष की बात है।

रजबन के दो और श्रद्धालु भी ला चुके 40 से ज्यादा कांवड़

रजबन निवासी 65 वर्षीय राजेंद्र उर्फ मुन्ना भाई भी 40 बार कांवड़ ला चुके हैं। उन्होंने वर्ष 1980 में पहली बार ट्रेन से हरिद्वार जाकर कांवड़ उठाई थी और मेरठ लौटकर औघड़नाथ मंदिर में भगवान आशुतोष का जलाभिषेक किया था। हालांकि पिछले दो वर्षों से उन्होंने कांवड़ यात्रा नहीं की है।

राजेंद्र बताते हैं कि पहले कांवड़ मार्ग पर इतने शिविर नहीं लगते थे और पुलिस-प्रशासन की ओर से भी आज जैसी व्यवस्थाएं नहीं होती थीं। अब पूरा कांवड़ मार्ग सेवा और श्रद्धा से शिवमय नजर आता है।

इसी तरह डाक विभाग से सेवानिवृत्त रजबन निवासी अनिल साहू भी वर्ष 1973 से लगातार श्रावण मास में कांवड़ लाते रहे हैं। वह 40 से अधिक बार हरिद्वार से पैदल कांवड़ यात्रा कर चुके हैं। हालांकि स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के कारण अब वह कांवड़ लेने नहीं जा पा रहे हैं।

No comments:

Post a Comment

Popular Posts