आवासीय भूमि पर चल रहे स्कूलों के भविष्य पर संकट
समाधान की रणनीति में जुटा स्कूल संचालकों का संगठन
AISLA ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उठाए सवाल, 7 लाख विद्यार्थियों और हजारों कर्मचारियों के हितों की चिंता जताई
मेरठ। सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश के बाद आवासीय भूमि पर संचालित विद्यालयों के भविष्य को लेकर चिंता बढ़ गई है। इस मुद्दे को लेकर ऑल इंडिया स्कूल लीडर्स एसोसिएशन (AISLA) ने मेरठ में महत्वपूर्ण बैठक आयोजित कर आगे की कानूनी और संगठनात्मक रणनीति पर मंथन किया।
बैठक की अध्यक्षता AISLA के राष्ट्रीय अध्यक्ष कवल जीत सिंह ने की। इसमें करीब 40 विद्यालय संचालकों ने भाग लिया। बैठक में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के संभावित प्रभाव, विद्यार्थियों की शिक्षा, शिक्षकों के रोजगार और विद्यालयों के संचालन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई।
बैठक के बाद AISLA का प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रीय अध्यक्ष कवल जीत सिंह के नेतृत्व में भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं वरिष्ठ नेता लक्ष्मीकांत बाजपेयी से मिला। प्रतिनिधिमंडल ने उन्हें पूरे मामले की स्थिति, संभावित प्रभाव और शिक्षा व्यवस्था पर पड़ने वाली चुनौतियों से अवगत कराया।
संगठन ने बताया कि मेरठ में करीब 3,660 विद्यालय संचालित हैं, जिनमें से 3,500 से अधिक विद्यालय आवासीय भूमि पर संचालित बताए जाते हैं। इन विद्यालयों में लगभग 7 लाख विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। संगठन का कहना है कि यदि व्यापक स्तर पर कार्रवाई होती है तो 70 से 80 हजार शिक्षकों तथा 50 से 60 हजार सहायक एवं अन्य कर्मचारियों के रोजगार पर असर पड़ सकता है।
AISLA ने आशंका जताई कि बड़ी संख्या में विद्यालय प्रभावित होने पर लाखों विद्यार्थियों की शिक्षा व्यवस्था बाधित हो सकती है। सीमित संख्या में उपलब्ध अन्य विद्यालयों में इतने विद्यार्थियों का समायोजन करना भी एक बड़ी चुनौती होगी।
संगठन ने लक्ष्मीकांत बाजपेयी से अनुरोध किया कि इस विषय को केंद्र और राज्य सरकार के समक्ष प्रभावी रूप से रखा जाए, ताकि विद्यार्थियों, शिक्षकों और विद्यालयों के हितों को ध्यान में रखते हुए व्यावहारिक समाधान निकाला जा सके।
AISLA के राष्ट्रीय अध्यक्ष कवल जीत सिंह ने बताया कि संगठन इस मामले में विस्तृत कानूनी रणनीति तैयार कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के समक्ष उचित कानूनी विकल्प अपनाने और आवश्यकता पड़ने पर जनहित याचिका (PIL) दायर करने पर भी विचार किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि संगठन न्यायालय के आदेशों का सम्मान करते हुए ऐसा समाधान चाहता है, जिससे विद्यार्थियों की शिक्षा, शिक्षकों का रोजगार और शिक्षा व्यवस्था प्रभावित न हो। इस संबंध में संगठन देश के वरिष्ठ सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ताओं से कानूनी परामर्श भी ले रहा है।


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