अस्तित्व का प्रश्न है वन संरक्षण
इलमा अज़ीम
आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के क्षरण, प्रदूषण और जल संकट जैसी अभूतपूर्व चुनौतियों से जूझ रही है, तब भारत में 1 से 7 जुलाई तक मनाया जाने वाला ‘वन महोत्सव’ केवल वृक्षारोपण का अभियान नहीं है बल्कि पृथ्वी पर जीवन बचाने का राष्ट्रीय संकल्प बन चुका है। वास्तव में यदि वर्तमान समय की आवश्यकताओं को देखा जाए तो वन महोत्सव से बड़ा कोई उत्सव नहीं हो सकता क्योंकि इसका संबंध केवल पर्यावरण से नहीं बल्कि मानव सभ्यता के भविष्य से है।
भारतीय परंपरा में वनों को देवतुल्य माना गया है। वे केवल पेड़ों का समूह नहीं बल्कि पृथ्वी के फेफड़े, जैव विविधता के सबसे बड़े आश्रय, नदियों के संरक्षक, जलवायु संतुलन के प्रहरी तथा करोड़ों लोगों की आजीविका के आधार हैं। वनों की स्थिति विश्व स्तर पर चिंताजनक बनी हुई है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, पृथ्वी का केवल लगभग 31 प्रतिशत भूभाग ही वनाच्छादित है जबकि प्रतिवर्ष लाखों हेक्टेयर वन क्षेत्र अवैध कटाई, औद्योगिकीकरण, खनन और अवसंरचनात्मक विकास की भेंट चढ़ रहा है।
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो आगामी दशकों में विश्व के अनेक वर्षावन गंभीर संकट में पड़ सकते हैं। ऐसे समय में भारत जैसे विशाल और जैव विविधता से समृद्ध देश की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। बढ़ते प्रदूषण के कारण कैंसर, हृदय रोग, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और फेफड़ों से संबंधित बीमारियों में तेजी से वृद्धि हो रही है। साथ ही, अनियमित मानसून, भीषण हीटवेव, सूखा, क्लाउडबर्स्ट और जंगलों में आग जैसी घटनाएं स्पष्ट संकेत हैं कि प्रकृति का संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है। इस संकट से निपटने के लिए वनों की भूमिका निर्णायक होगी।
विकास और पर्यावरण परस्पर विरोधी नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। आर्थिक प्रगति, आधुनिक तकनीक और अवसंरचनात्मक विकास आवश्यक हैं किंतु वे स्वच्छ वायु, शुद्ध जल और संतुलित जलवायु का विकल्प नहीं बन सकते। यदि वन सुरक्षित रहेंगे तो नदियां जीवित रहेंगी, भूजल समृद्ध होगा, जैव विविधता संरक्षित रहेगी और मानव सभ्यता का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।





No comments:
Post a Comment