राष्ट्रीय वृक्ष बरगद: दरकार है संरक्षण की
- डॉ. ओम प्रकाश चौधरी
स्वास्थ्य से लेकर धार्मिक मान्यताओं को मजबूती प्रदान करने वाले राष्ट्रीय वृक्ष बरगद के संरक्षण पर भी ध्यान देना जरूरी है। बरगद के वृक्ष के लुप्त होने में सरकार और वन विभाग भी कम जिम्मेदार नहीं है । वन विभाग ने आज तक बरगद के वृक्ष को बचाने के लिए कोई जागरूकता कार्यक्रम नहीं लाई है। आजकल नर्सरियों में बरगद का पौधा नहीं के बराबर मिलता है । सरकार को इस पर ध्यान देते हुए पंचायत स्तर से जागरूकता कार्यक्रम चलाना होगा ताकि अधिक ऑक्सिजन देने वाला हमारा राष्ट्रीय वृक्ष बरगद विलुप्त होने से बच सके।
भारतवर्ष का 'राष्ट्रीय वृक्ष' बरगद औषधीय गुणों से सम्पन्न एक विशालकाय पेड़ है, जिसकी ऊंचाई लगभग 25 मीटर तक होती है। यह अपने विशालकाय शाखाओं, गहरी जड़ों, दीर्घजीवी होने के कारण अमरता का प्रतीक है। इसकी उम्र हजार वर्ष होती है।गुजरात का अक्षय वट और कोलकाता का महान बरगद काफी पुराना है। इसकी शाखाओं से वायवीय जड़ें लटकती हैं, जो जमीन में घुसकर तना बन जाती हैं।कोलकाता का वटवृक्ष 1.5 एकड़ में फैला हुआ है।
भारत देश की एकता और अखंडता का भी प्रतीक है, क्योंकि इसकी अनेकानेक शाखाएं वृक्ष का रूप धारण कर लेती हैं। इसकी यही सभी विशेषताएं इसे राष्ट्रीय वृक्ष की श्रेणी में ला खड़ा कर देते हैं। इसे कल्पतरु के नाम से भी पुकारा जाता है। किसी भी देश का राष्ट्रीय वृक्ष उस राष्ट्र का चिन्ह होता है, गौरव होता है। उसका एक सांस्कृतिक महत्व होता है, जो राष्ट्र की धरोहर होने के साथ ही, उसकी संस्कृति की अभिव्यक्ति होता है।
बरगद, भारत का राष्ट्रीय प्रतीक होने के कारण आध्यात्मिक व सांस्कृतिक महत्व भी रखता है। यह एक तरह से अपने देश की विरासत है। सदियों से यह ग्रामीण समुदाय का केन्द्र बिंदु रहा है, लगभग प्रत्येक गॉव व पुरवा, कस्बा, बाजार या शहर में यह जरूर पाया जाता है। वट वृक्ष की छांव मे जानवरों को छाया तो मिलती ही है, ग्रामवासी भी एकत्र होकर अपनी बातचीत करते हैं। यह अपने विशाल स्वरूप के कारण लोगों को छाया प्रदान करता है और इसके नीचे अनेक गतिविधियां विशेषकर बच्चों के खेलने व पशुओं के आराम करने का सबसे मुफीद स्थान होता है।
इस वृक्ष पर छोटे छोटे फल लगते हैं,जिसे "गोदा" कहा जाता है, यह असंख्य जीवों का आहार होता है। इसीलिए इसको इकोसिस्टम का सुपरमार्केट कहा जाता है। साथ ही छोटे -छोटे पंक्षी इसे खाकर दूर तक ले जाते हैं, इनके बीट से ही बरगद बीज के रूप में फैलता है। यह जरूर माना जाता है कि बरगद भारत भूमि का सबसे लंबी उम्र का वृक्ष है। इसे वट, बड़, बद्र, बॉट, बता, बारा, वटगाच, वडालो, आला, अलदमारा, आलम, मारी, बनयान आदि नामों से भी विभिन्न भाषाओं में जाना जाता है। यह जैसे जैसे बड़ा होता है इसके तनों से जड़े निकलती हैं, जिसे बररोह कहते हैं और वह नीचे लटकते लटकते जमीन पर आ जाती है और उसमें अपनी जड़ें जमा लेती हैं।
वाराणसी (उत्तर प्रदेश) में कचेहरी के पास परिसदन के सामने एक ऐसा ही वट वृक्ष है जिसकी अनेक शाखाएं हैं जो धरती में अपनी जड़ें जमाकर एक अलग पेड़ होने का एहसास कराती हैं। अपनी जड़ों के कारण यह आकाशीय बिजली या अन्य प्राकृतिक आपदाओं से भी सुरक्षित रह पाता है, इसको कोई क्षति नहीं पहुंचती है।
वट वृक्ष को "वट सावित्री" या "अक्षय वट" भी कहा जाता है। इसके साथ सावित्री -सत्यवान की पौराणिक कहानी भी जुड़ी हुई है। मान्यता है कि वट वृक्ष के नीचे ही सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस लेकर पुनः जीवित किया था।हिन्दू धर्म में महिलाएं ज्येष्ठ माह की अमावस्या को "वट सावित्री अमावस्या"के रूप में बरगद की पूजा कर अपने पति सहित पूरे परिवार की लंबी उम्र व समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। इसकी परिक्रमा हमारी आस्था से जुड़ा हुआ है। हिदू धर्म में त्रिदेव के रूप में ब्रह्मा, विष्णु, महेश को माना जाता है, उसी प्रकार वृक्षों में पीपल, नीम व वट वृक्ष को त्रिमूर्ति स्वरूप माना जाता है। साथ ही इसका औषधीय उपयोग भी किया जाता है।
कोरोना महामारी से जब पूरी दुनियां गिरफ्त में थी,और ऑक्सिजन की कमी के कारण लोग काल कवलित हो रहे थे,ऐसे में "बरगद"की उपयोगिता और अंधिक बढ़ जाती है, क्योकि अपनी विशालता और चौड़ी पत्ती के कारण वातावरण से कार्बन डाईऑक्साइड सोखने और ऑक्सिजन छोड़ने की इसकी क्षमता बेजोड़ है। बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी, जो इनकी पत्तियों से निर्मित होती है उसमें दर्जन भर सूक्ष्मजीव पाए जाते हैं। यह एक उत्तम जैविक खाद का काम करती है। राष्ट्रीय जैविक कृषि केन्द्र ग़ाज़ियाबाद और राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान नासिक के वैज्ञानिकों ने अपने शोध में पाया है कि बरगद के नीचे की मिट्टी फसलों के लिए बहुत लाभदायक है। आयुर्वेद में इसकी जड़, छाल, दूध, पत्ती सभी लाभदायक बताये गए हैं।
मैने अभी तक पीपल, नीम, तुलसी अभियान के संस्थापक डॉ धर्मेंद्र कुमार (पटना, बिहार) से प्रेरणा ग्रहण कर पांच पेड़ ही लगाए हैं, क्योंकि इसके लिए बहुत अधिक रिक्त स्थान की जरूरत होती है, लेकिन अब कोशिस करेंगे कि इसमें और इजाफा करेंगे। अभी विगत माह अपने पैतृक गॉव मैनुद्दीनपुर, जलालपुर, अम्बेडकरनगर से पारा (शिव मंदिर) जाना हुआ वहां पावन सलिला तमसा के किनारे वट वृक्ष रोपण के लिए स्थान चिन्हित कर सहमति ले लिया है, बस पावस ऋतु का इंतजार है। साथ ही गूलर के लिए अब्दुल समद भाई के नव निर्मित ईंट भट्ठे (कटघर मूसा,अम्बेडकरनगर) पर जगह आरक्षित कर लिया है,एक दो स्थान और भी देखा है।'सहज पके सो मीठा होय' की तर्ज पर धीरे -धीरे धरती माँ को हरा भरा करने में अपना अकिंचन योगदान देते रहना अपना पुनीत कर्तव्य समझता हूँ।
(सेवा निवृत्त शिक्षक, श्री अग्रसेन कन्या पीजी कॉलेज, वाराणसी)





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