बचपन पर बढ़ता शैक्षिक बोझ
- मनीषा मंजरी
किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके बच्चों की आँखों में पलने वाले सपनों में बसता है। वे सपने तभी आकार लेते हैं जब उनका बचपन स्वतंत्र हो, उनकी जिज्ञासा जीवित हो और सीखने की प्रक्रिया उनके लिए आनंद का विषय बने। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल अक्षरज्ञान कराना या परीक्षा में अधिक अंक प्राप्त करवाना नहीं है, बल्कि बच्चों के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है। दुर्भाग्यवश आज हमारी प्रारंभिक शिक्षा व्यवस्था इस मूल उद्देश्य से भटकती हुई दिखाई देती है। नर्सरी और प्राथमिक कक्षाओं में ही बच्चों पर पढ़ाई का इतना अधिक बोझ डाल दिया जाता है कि उनका बचपन धीरे-धीरे पुस्तकों के पन्नों के बीच सिमटने लगता है।
वह आयु, जिसमें बच्चों को मिट्टी से खेलना चाहिए, रंगों से कल्पनाएँ गढ़नी चाहिए, पेड़ों की छाया में दौड़ना चाहिए और प्रकृति से संवाद करना चाहिए, उसी आयु में उनके कंधों पर भारी-भरकम बस्ते लाद दिए जाते हैं। लंबा पाठ्यक्रम, प्रतिदिन का गृहकार्य, कठिन प्रोजेक्ट और निरंतर मूल्यांकन उनके जीवन का हिस्सा बन जाते हैं। परिणामस्वरूप शिक्षा एक आनंददायक यात्रा न होकर दबाव और भय का पर्याय बन जाती है। यह स्थिति केवल बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित नहीं करती, बल्कि उनके स्वाभाविक विकास को भी बाधित करती है।
विडंबना यह है कि आज छोटे बच्चों के विद्यालयी प्रोजेक्ट भी ऐसे बनाए जाते हैं जिन्हें बच्चे स्वयं पूरा नहीं कर सकते। अंततः माता-पिता ही रात-रात भर जागकर मॉडल तैयार करते हैं, चित्र बनाते हैं और प्रस्तुतियाँ सजाते हैं। ऐसे प्रोजेक्ट बच्चों की प्रतिभा का नहीं, बल्कि अभिभावकों के समय, संसाधनों और कौशल का प्रदर्शन बनकर रह जाते हैं।
शिक्षा का उद्देश्य यदि आत्मनिर्भरता और सीखने की क्षमता विकसित करना है, तो ऐसी व्यवस्था उस उद्देश्य के बिल्कुल विपरीत प्रतीत होती है। आज अनेक विद्यालयों में शिक्षा के स्थान पर प्रदर्शन की संस्कृति विकसित होती दिखाई देती है। आकर्षक भवन, आधुनिक सुविधाएँ और भव्य आयोजनों के बीच शिक्षा का मूल स्वर कहीं खोता जा रहा है। भारी फीस, अतिरिक्त गतिविधियों के नाम पर बढ़ते शुल्क और प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ ने शिक्षा को एक प्रकार का व्यवसाय बना दिया है। अभिभावक अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए हर संभव प्रयास करते हैं, किंतु कई बार वे अनजाने में उसी दबावपूर्ण व्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं, जो बच्चों के बचपन को सबसे अधिक प्रभावित करती है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस व्यवस्था में बच्चों की जिज्ञासा धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। वे प्रश्न पूछने के स्थान पर उत्तर रटने लगते हैं। उनकी कल्पनाशक्ति, रचनात्मकता और स्वतंत्र चिंतन अंक प्राप्त करने की होड़ में कहीं पीछे छूट जाते हैं। जबकि बाल मन स्वभाव से जिज्ञासु होता है। वह हर वस्तु को छूकर, देखकर, अनुभव करके सीखना चाहता है। यदि उसे केवल पुस्तकों और गृहकार्य तक सीमित कर दिया जाए, तो उसकी सीखने की स्वाभाविक प्रक्रिया बाधित हो जाती है।
विश्व के अनेक विकसित देशों की शिक्षा प्रणाली इस दृष्टि से प्रेरणादायक है। वहाँ प्रारंभिक शिक्षा का आधार खेल, प्रयोग, अनुभव और संवाद को बनाया गया है। बच्चों को प्रकृति के बीच सीखने, समूह में कार्य करने, अपनी जिज्ञासा व्यक्त करने तथा व्यावहारिक जीवन कौशल विकसित करने के अवसर दिए जाते हैं। वहाँ यह माना जाता है कि शिक्षा का प्रथम उद्देश्य बच्चे के भीतर सीखने का उत्साह जगाना है, न कि उसे प्रारंभ से ही प्रतिस्पर्धा की दौड़ में धकेल देना। यही कारण है कि वहाँ के बच्चे आत्मविश्वासी, रचनात्मक और स्वतंत्र विचारों वाले नागरिक बनकर उभरते हैं। भारत जैसे युवा देश में भी समय की माँग है कि प्रारंभिक शिक्षा को बच्चों की आयु, मनोविज्ञान और क्षमता के अनुरूप पुनर्गठित किया जाए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने भी अनुभवात्मक एवं गतिविधि-आधारित शिक्षा पर बल दिया है, किंतु इसकी वास्तविक सफलता तभी संभव होगी जब इसे प्रत्येक विद्यालय में गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ लागू किया जाए। बच्चों के बस्तों का भार कम किया जाए, गृहकार्य को सीमित और सार्थक बनाया जाए, प्रोजेक्ट ऐसे हों जिन्हें बच्चे स्वयं पूरा कर सकें तथा शिक्षा को परीक्षा-केंद्रित बनाने के स्थान पर जीवन-केंद्रित बनाया जाए।
साथ ही, अभिभावकों की भूमिका भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चे को सफल देखना चाहते हैं, किंतु सफलता का अर्थ केवल अधिक अंक प्राप्त करना नहीं होता। यदि बच्चा संवेदनशील, जिज्ञासु, आत्मविश्वासी और नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण बनता है, तो वही शिक्षा की सबसे बड़ी उपलब्धि है। बच्चों की तुलना दूसरों से करने के स्थान पर उनकी व्यक्तिगत रुचियों और क्षमताओं को समझना आवश्यक है। हर बच्चा अपनी गति से सीखता है और उसी गति का सम्मान किया जाना चाहिए। यह भी स्मरण रखना होगा कि बचपन जीवन का वह अध्याय है जो एक बार बीत जाने के बाद कभी लौटकर नहीं आता। यदि यही समय तनाव, भय और अनावश्यक दबाव में व्यतीत हो जाए, तो उसके दूरगामी दुष्परिणाम केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरे व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं। स्वस्थ समाज वही होता है जहाँ बच्चों की मुस्कान पुस्तकों के बोझ तले दबने के बजाय उनके सपनों के साथ खिलती है।
शिक्षा का अर्थ केवल विद्यालय की चारदीवारी में सीमित ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाना है। ऐसी शिक्षा, जो बच्चे के मन में जिज्ञासा जगाए, उसके व्यक्तित्व को संवेदनशील बनाए, उसे प्रश्न पूछने का साहस दे और जीवन की वास्तविक चुनौतियों का सामना करने योग्य बनाए। जब तक हमारी शिक्षा व्यवस्था बचपन को बचाने का संकल्प नहीं लेती, तब तक केवल पाठ्यक्रम बदलने से अपेक्षित परिवर्तन संभव नहीं होगा। आवश्यकता इस बात की है कि हम बच्चों को केवल सफल नहीं, बल्कि प्रसन्न, रचनात्मक और मानवीय नागरिक बनने का अवसर दें। क्योंकि शिक्षा की सबसे बड़ी उपलब्धि अंकों से नहीं, बल्कि मुस्कुराते हुए बचपन और सशक्त व्यक्तित्व से मापी जाती है।
(कवयित्री और उपन्यासकार)



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