"मौकापरस्त नारीवाद"
- रविकांत राऊत
आज के दौर की एक कड़वी सच्चाई है। यह वह नारीवाद है जो हक़ीक़त में ज़मीन पर संघर्ष कर रही औरतों के काम नहीं आता, बल्कि सिर्फ़ सोशल मीडिया के हैशटैग्स, बड़े-बड़े कॉर्पोरेट विज्ञापनों, और 'सुविधाजनक'जगहों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है।
यह नारीवाद तब चुप रहता है जब खेत में काम करने वाली मज़दूर औरत का शोषण होता है, लेकिन जब खुद के स्वार्थ, फेम (प्रसिद्धि) या विक्टिम कार्ड खेलने की बात आती है, तो यह 'Woke' बनकर खड़ा हो जाता है।
इक्कीसवीं सदी के उत्तर-आधुनिक विमर्शों में यदि किसी शब्द ने अपनी रूह को सबसे तेजी से खोया है, तो वह शब्द है—'Woke' (चेतना)। आज का तथाकथित 'वोक नारीवाद' (Woke Feminism) अब मुक्ति का घोषणापत्र नहीं, बल्कि बौद्धिक कुलीनतंत्र और नव-उदारवादी बाज़ार का एक बेहद परिष्कृत, चमकीला उत्पाद बन चुका है। यह एक ऐसा मौकापरस्त दर्शन है, जो तब तक ही दहाड़ता है जब तक कि कैमरे के फ्लैश और सोशल मीडिया के एल्गोरिदम इसकी गूँज को 'लाइक्स'और 'शेयर्स'में भुनाते रहते हैं। जैसे ही कैमरे बंद होते हैं और चकाचौंध ढलती है, यह विमर्श एक ठंडे सन्नाटे में तब्दील हो जाता है।
यह विडंबना ही है कि जो आंदोलन कभी फैक्ट्रियों के कमरों, कोयले की खदानों और खेतों की पगडंडियों से उपजा था, वह आज महानगरीय एलीट क्लबों के 'एस्थेटिक'विलाप और डिजिटल बायो के हैशटैग में सिमट गया है। जोन डिडियन की निर्लिप्त और मर्मभेदी दृष्टि से देखें, तो यह नारीवाद संस्कृति के उस खोखलेपन का उत्सव है जहाँ 'पीड़ा'को गरिमा देने के बजाय उसका 'ब्रांडिंग'किया जा रहा है। यहाँ संघर्ष अब एक सामूहिक चेतना नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वार्थों को साधने का एक नया 'विक्टिम कार्ड'बन चुका है।
इस दौर का मौकापरस्त नारीवाद एक खास तरह के भाषाई पाखंड से ग्रस्त है, जिसे जॉर्ज ऑरवेल ने बहुत पहले अपनी चेतावनियों में रेखांकित किया था। शब्दों के अर्थ बदल दिए गए हैं। 'समानता'का अर्थ अब न्यायपरक समाज का निर्माण नहीं, बल्कि पुरुषों के विशेषाधिकारों की अंधी और हिंसक नकल मात्र रह गया है। यह विमर्श उस माँ, उस पारंपरिक गृहणी या उस मज़दूर औरत को हेय दृष्टि से देखता है जो चूल्हे के धुएँ के बीच अपने हिस्से की आज़ादी और वजूद को बचाए हुए है। जो औरत बाज़ार के तयशुदा मापदंडों में फिट नहीं बैठती, यह 'वोक'जमात उसे तुरंत 'पिछड़ा'घोषित कर देती है। यह कैसा ‘सिस्टरहुड’ है जो केवल वर्ग, अंग्रेजी लहजे और कॉर्पोरेट ओहदों को देखकर एकजुट होता है?
सल्मान रुश्दी की अति-यथार्थवादी दृष्टि उधार लेकर कहें तो, आज का बाज़ार इस छद्म-नारीवाद का सबसे बड़ा प्रायोजक है। कॉर्पोरेट घराने आठ मार्च को नारी-शक्ति के बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाते हैं, लेकिन अपनी ही फैक्ट्रियों में न्यूनतम मजदूरी पर काम कर रही औरतों के बुनियादी अधिकारों को कुचल देते हैं। यह 'Woke'चेतना इस दोहरेपन पर मौन रहती है, क्योंकि इसकी नाल खुद उसी व्यवस्था से जुड़ी है। मुक्तिबोध के शब्दों में कहें तो, यह इस विमर्श का 'अंधेरे में'खो जाना है, जहाँ पूंजीपति और बौद्धिक ढोंगी मिलकर एक नया चेहरा ओढ़ लेते हैं।
जब तक यह आंदोलन सोशल मीडिया की आभासी दुनिया से निकलकर भारत के सुदूर देहातों, खेतों और श्रमसाध्य बस्तियों की औरतों के पसीने से नहीं जुड़ेगा, तब तक यह सिर्फ़ एक 'मौकापरस्त विलाप'ही रहेगा। हकीकत की ज़मीन पर खड़ी औरत आज भी सभ्यता के उसी नंगे सच से जूझ रही है जिससे सदियों पहले जूझती थी। आज ज़रूरत इस बात की है कि हम इस चमकते हुए पाखंड के चेहरे से 'Woke' का नकाब नोच फेंके और नारीवाद को उसकी खोई हुई सामाजिक रूह और वास्तविक जन-संघर्ष वापस लौटाएं।
(व्यंग्यकार-लेखक, जबलपुर, मध्यप्रदेश)





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