- चन्द्रकांत खुंटे
"इतिहास गवाह है- जब अच्छे लोग चुप रहते हैं, तब अन्याय और मज़बूत हो जाता है।" महान दार्शनिक एडमंड बर्क का यह विचार आज के भारतीय समाज के आईने में बिल्कुल सटीक बैठता है। आज हम एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहाँ चारों तरफ हो रहे गलत कार्यों को देखकर भी बहुसंख्यक आबादी मौन साधे हुए है। यह चुप्पी किसी भी जीवंत लोकतंत्र और समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा है। जब समाज के अच्छे, ईमानदार और समझदार लोग किसी गलत बात पर आँखें मूंद लेते हैं, तो बुरे तत्वों का हौसला सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। अन्याय की ताकत उसकी अपनी शक्ति में नहीं, बल्कि हमारी चुप्पी में छिपी होती है।
सवाल उठता है कि हम फिर से चुप क्यों हैं? इस गहरी चुप्पी के पीछे कई सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण हैं। पहला कारण 'व्यक्तिगत स्वार्थ और डर' है। आज का आम इंसान अपनी रोजमर्रा की जिंदगी, नौकरी और परिवार में इतना व्यस्त है कि वह किसी भी तरह के विवाद से बचना चाहता है। उसे डर है कि आवाज उठाने पर उसकी सुरक्षा, जीविका या शांति भंग हो सकती है। दूसरा कारण 'अकर्मण्यता और उदासीनता' है। लोग यह मान चुके हैं कि "मेरे अकेले के बदलने से क्या होगा" या "यह मेरी समस्या नहीं है।" यह 'चलता है' वाला रवैया समाज को अंदर से खोखला कर रहा है। तीसरा कारण आभासी दुनिया का भ्रम है, जहाँ लोग संगणक और दूरभाष के मंचों पर गुस्सा तो जाहिर करते हैं, लेकिन वास्तविक धरातल पर सामूहिक विरोध दर्ज कराने से कतराते हैं।
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वर्तमान समय में इस चुप्पी का सबसे घातक असर हमारे देश के युवाओं के भविष्य पर पड़ रहा है। आज शिक्षा और रोजगार का क्षेत्र पूरी तरह से भ्रष्टाचार और भूमाफियाओं की गिरफ्त में नजर आ रहा है। देश की सबसे प्रतिष्ठित और बड़ी परीक्षाओं में लगातार हो रहे प्रश्नपत्र लीक के मामलों ने लाखों छात्रों के भविष्य को दांव पर लगा दिया है। सालों तक दिन-रात एक कर के, तंग कमरों में रहकर तैयारी करने वाले ईमानदार छात्रों की मेहनत पर चंद रुपयों के लालची तत्व पानी फेर देते हैं। परीक्षाओं का रद्द होना, परिणामों में देरी और नौकरियों की सरेआम बोलियां लगना अब एक कड़वी हकीकत बन चुका है। जब योग्य युवा सड़क पर लाठियां खाता है और अयोग्य लोग पैसे के दम पर उच्च पदों पर बैठते हैं, तब समाज की रीढ़ टूट जाती है। इस भयानक अन्याय पर पूरे देश का चुप रहना एक बड़े नैतिक पतन की निशानी है।
इतिहास गवाह है कि जब-जब समाज का प्रबुद्ध वर्ग मौन रहा, तब-तब मानवता को भारी कीमत चुकानी पड़ी। महात्मा गांधी ने कहा था कि "अन्याय का सहना भी उतना ही बड़ा अपराध है जितना अन्याय करना।" यदि हम आज अपने आस-पास हो रहे भ्रष्टाचार, प्रश्नपत्र लीक, युवाओं के साथ हो रहे धोखे, और कमजोरों के शोषण पर चुप रहते हैं, तो हम अनजाने में उस अन्याय के भागीदार बन जाते हैं। हमारी यह चुप्पी आने वाली पीढ़ी के भविष्य को अंधकार में धकेल रही है। जो समाज गलत को सहने का आदी हो जाता है, वह अंततः अपनी स्वतंत्रता और नैतिक अधिकार भी खो देता है।
इसलिए, आज समय की मांग है कि हर भारतीय गलत के विरोध में एक साथ खड़ा हो। सामूहिक आवाज में वह शक्ति होती है जो बड़ी से बड़ी दमनकारी सत्ता और भ्रष्ट तंत्र को भी झुकने पर मजबूर कर देती है। भारत का स्वतंत्रता संग्राम इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है। यदि हमारे स्वतंत्रता सेनानी यह सोचकर चुप बैठ जाते कि विदेशी हुकूमत बहुत शक्तिशाली है, तो शायद हम आज भी गुलामी की जंजीरों में जकड़े होते। आज हमें सीमाओं पर लड़ने की जरूरत नहीं है, बल्कि समाज के भीतर मौजूद इस परीक्षा और रोजगार भ्रष्टाचार रूपी दीमक से लड़ने के लिए एकजुट होने की जरूरत है।
गलत का विरोध करने का मतलब हमेशा सड़कों पर उतरकर उपद्रव करना नहीं होता। इसका मतलब है अपने स्तर पर सच का साथ देना और भ्रष्ट व्यवस्था पर सवाल उठाना। यदि कार्यस्थल या परीक्षाओं में कोई धांधली हो रही है, तो मूकदर्शक बनने के बजाय उसके खिलाफ आवाज उठाएं। जब पूरा देश जाति, धर्म और क्षेत्रीयता की दीवारों को तोड़कर युवाओं के रोजगार और न्याय के लिए एक सुर में बोलेगा, तभी एक मजबूत, पारदर्शी और निष्पक्ष राष्ट्र का निर्माण संभव है।
निष्कर्ष के तौर पर, हमारी चुप्पी अन्याय के लिए खाद-पानी का काम करती है। यदि हम चाहते हैं कि हमारा देश सचमुच महान बने, तो हमें युवाओं के हक के लिए अपनी इस चुप्पी को तोड़ना होगा। याद रखिए, आने वाला इतिहास सिर्फ भ्रष्ट अधिकारियों और अपराधियों के जुल्मों को ही याद नहीं रखेगा, बल्कि अच्छे लोगों की उस रहस्यमयी चुप्पी पर भी सवाल उठाएगा जिसने देश के भविष्य को बिकने दिया। उठिए, जागिए और गलत के खिलाफ एकजुट होकर आवाज बुलंद कीजिए, क्योंकि आपकी एक आवाज समाज को बदलने की ताकत रखती है।
(जांजगीर-चाम्पा, छत्तीसगढ़)






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