स्मार्टफोन का संयमित उपयोग जरूरी
 इलमा अज़ीम 
आज का युग डिजिटल युग है, जहां एक क्लिक पर पूरी दुनिया हमारी हथेली में सिमट आई है। स्मार्टफोन ने संचार, शिक्षा, व्यापार, बैंकिंग, स्वास्थ्य, शासन और सामाजिक संबंधों को नई दिशा दी है। लेकिन हर तकनीकी क्रांति अपने साथ कुछ गंभीर चुनौतियां भी लेकर आती है। स्मार्टफोन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

 यह जितना बड़ा वरदान सिद्ध हुआ है, उतना ही बड़ा अभिशाप भी बनता जा रहा है। विशेष रूप से बच्चों और किशोरों पर इसके दुष्प्रभावों ने पूरी दुनिया को चिंतित कर दिया है। वास्तव में स्मार्टफोन जहां वरदान है, वहीं अभिशाप भी है। इससे ज्ञान का भंडार भी उपलब्ध है और भ्रम का संसार भी। यह शिक्षा का माध्यम भी है और अश्लीलता तथा हिंसा का प्रवेश-द्वार भी। यह रोजगार के अवसर भी देता है और साइबर अपराध की राह भी खोलता है। 

आज अनेक युवा रातों-रात अमीर बनने की लालसा में साइबर ठगी, सेक्सटॉर्शन, ऑनलाइन जुआ और डिजिटल धोखाधड़ी जैसे अपराधों में फंस रहे हैं। सोशल मीडिया पर फैल रही अश्लील सामग्री, फेक न्यूज, नफरत और ट्रोल संस्कृति ने सामाजिक मूल्यों को गहरी चोट पहुंचाई है। सबसे अधिक चिंता का विषय बच्चों और किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य है। शोध बताते हैं कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम से बच्चों की एकाग्रता, स्मरण शक्ति और रचनात्मक क्षमता प्रभावित होती है।

 नींद में कमी, चिड़चिड़ापन, अवसाद, चिंता, आत्महत्या की प्रवृत्ति और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। परिवारों में संवाद कम हुआ है और डिजिटल निकटता के बावजूद भावनात्मक दूरियां बढ़ी हैं। बच्चे खेल के मैदानों से दूर होकर आभासी दुनिया में खोते जा रहे हैं। इसलिए आवश्यक है कि एआई और स्मार्टफोन के उपयोग के साथ-साथ डिजिटल नैतिकता, मानवीय मूल्यों और कानूनी जिम्मेदारियों का भी समुचित प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि तकनीक मानवता के विकास का साधन बने, विनाश का नहीं। 

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