मंदिरों की आय धर्मार्थ कार्यों में खर्च हो


- प्रो. नंदलाल
भारतवर्ष में मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा बहुत से बने हुए हैं और बन भी रहे हैं।ये हमारे आस्था की शरण हैं और बिना इनके हिंदुस्तान का कोई अर्थ नहीं निकलता। ये हमारे प्रतीक और शरणस्थली हैं।हर हिंदू अपने मुहल्ले और गांव में कोई न कोई छोटा मोटा मंदिर बनाए हुए है और महत्वपूर्ण उत्सवों व तिथियों पर अपने इष्ट का दर्शन करने और जल चढ़ाने के लिए लोग मंदिरों में जाया करते हैं। वैसे तो बहुतेरे ऐसे लोग हैं जो अपने दिनचर्या में इसे शामिल कर रखे हैं। बिना दर्शन और परिक्रमा के अन्न भी ग्रहण नहीं करते।हर आस्थावान हिन्दू के जीवन में उसका आराध्य ही उसके स्वास्थ्य, संपत्ति, और प्रसन्नता का आधार है। वही उसका रक्षक है, वही उसका सब कुछ है।
यही भारत की संस्कृति है और भारतीय एकता का सूत्र भी यही है।वेदांत से लेकर वेद, उपनिषद, पुराण,ब्राह्मण ग्रन्थ,स्मृतियाँ सभी भारतीयों को यही शिक्षा देते हैं कि यदि तुम्हे अपने आप को जानना हो तो अपने आप को समझो। तुम्हारे तारणहार परमात्मा और सर्वोच्च सत्ता है। उनकी प्राप्ति चाहे निराकार रूप से करो या मूर्ति पूजा करके ,जिस किसी भी तरीके से उन्हें जान सको तो कोशिश अवश्य करो। और उनको जानने के लिए ही इन सद्ग्रंथो के माध्यम से प्राप्ति का मार्ग बताया गया है। तीर्थ जाओ, नदी स्नान करो, वृक्षों को पूजो, पर्वतो को पूजो, कुंभ नहाओ, दान करो, व्रत रखो या उपवास करो, कोई मार्ग तो निकालो जो तुम्हे उस महागुरु के बारे में बता सके।
       इतने कठिन तप से लोग मंदिरों तक जाते हैं।मसुदूर की यात्राएं करते हैं। कठिन रास्तों पर चलते हैं और जब वहां पहुंचते हैं तो वहां का दृश्य रूह कंपा देने वाला होता है। पता चलता है कि वहां वीआईपी दर्शन भी होता है।पता नहीं यह कौन सी व्यवस्था है। ईश्वर के दर्शन में वीआईपी दर्शन। किन लोगों के लिए, यह व्यवस्था की गई है।पैसे वालों के लिए या शक्ति संपन्न लोगो के लिए। किसी वृद्ध, रोगी, अक्षम, दिव्यांग जन के लिए होता तो बात समझ में आती पर ऐसा नहीं है। यहीं से मंदिरों में गलत परंपरा शुरू होती है और इसका रूप कुरूप होता जाता है।आज बहुत से मंदिर में आप पाएंगे कि नीचे मंदिर और ऊपर होटल खुले हुए हैं।
    देश में अनेको मंदिर ऐसे हैं जहां करोड़ों रुपये,पैसे,चांदी,सोना,हीरे और जवाहरात चढ़ावे में चढ़ते हैं।उन मंदिरों की आय इतनी है कि उसके बारे में लिखना कठिन है।माता वैष्णव देवी मंदिर,तिरुपति बाला जी मंदिर,सोमनाथ मंदिर,शिरडी ट्रस्ट,काशी विश्वनाथ मंदिर,वैद्यनाथ धाम, पुरी एवं अनेकों मंदिर ऐसे हैं जहां भक्तों की भारी भीड़ एकत्र होती है।चढ़ावे इतने आते हैं कि उनको गिनना कठिन होता है।ऐसे मंदिरों से होने वाली आय की व्यवस्था पारदर्शी होनी चाहिए।इस पैसे से यदि अस्पताल,कैंसर संस्थान,शिक्षा संस्थान और गरीबों, अनाथों के लिए अनाथालय,वृद्धाश्रम इत्यादि बनवाये जाय तो उस पैसे का सदुपयोग होगा।
मंदिरों के रखरखाव में भी काफी पैसा खर्च होता है।वहां काम करने वाले लोगों के मानदेय पर भी काफी पैसा खर्च होता है।जितने लोग मंदिर से जुड़े होते हैं उनके रहने खाने पीने की भी व्यवस्था पर पैसे खर्च होते हैं।अनेकों मंदिर ऐसे हैं जहां लंगर भी चलाये जाते हैं।इस तरह मंदिरों को सुव्यवस्थित रखने और उनके संचालन पर अधिक पैसे खर्च होते हैं।तथापि इससे कहीं अधिक आय प्रसिद्ध मंदिरों से होती है।ऐसे मंदिरों के लिए एक व्यवस्था बननी चाहिए जिससे पारदर्शिता बनी रहे।आरोप किसी पर भी लगाया जा सकता है।पर मंदिरों की व्यवस्था यदि व्यवस्थित नहीं है तो लोगों की नियति डोलने में समय नहीं लगता और पैसा, चढ़ावा इधर उधर हो जाता है।

हिंदुओं के जीवन में मंदिरों और मठों का बहुत ऊंचा स्थान है।ये हमारे जीवन पद्धति की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में है।हमारे आस्था और विश्वास के केंद्र बिंदु हैं।जब इन मंदिरों से किसी गड़बड़ी की बात उठती है तो सहज भरोसा नहीं होता है।इसलिए समूचे देश के लिए एक ऐसी नियमावली बननी चाहिए कि मंदिर का प्रबंधन सुव्यवस्थित तरीके से चलता रहे।आजकल लोगों के अंदर मूल्यों की भी गिरावट बहुत है।एक तरफ लोग पुण्य कमाने के लिए लोग मंदिरों में मिन्नतें माँगते है और चढ़ावे चढ़ाते हैं तो दूसरी तरफ ऐसे भी लोग हैं जो भगवान के लिए समर्पित पैसे की हेरा फेरी कर देते हैं।हम कहते हैं कि कण कण में भगवान हैं और सभी के कृत्यों को अहर्निश देखते हैं तो दूसरी तरफ उनकी भी परवाह न करने वाले लोग हैं।उनसे नजरें चुराकर  गलत व्यवहार करते हैं।इस पर त्वरित विचार करने की जरूरत है क्योंकि हिंदुओं की आस्था से खिलवाड़ सामान्य घटना नहीं होती।लोग आस्था के लिए अपनी जान भी कुर्बान कर देते हैं।

हालांकि ऐसी घटनाएं यदा कदा सुनने में आती है पर यह तो सत्य है कि कुछ प्रसिद्ध मंदिरों में बहुत अधिक चढ़ावे आते हैं।उन पैसों का उपयोग जनहित में करना उचित होगा। भारत वर्ष जैसे बड़े देश में अस्पतालों की बहुत कमी है,उन पैसों से मंदिर व्यवस्थापकों को उच्च स्तरीय अस्पताल खोलने चाहिए जहां असहायों, गरीबों, जरूरतमंद लोगों को उचित उपचार मिल सके।पंडित मदन मोहन मालवीय ने जब बी एच यू की स्थापना की तो उनकी यही सोच थी। उन्होंने वहां एक ऐसा अस्पताल बनवाया जिससे कई राज्यों के लोग लाभान्वित होते हैं। सबसे पहले रुग्णावस्था में बीएचयू ही याद आता है।आग्रह तो यही है कि इस पर गौर किया जाना चाहिए और शुद्ध सात्विक लोगों को मंदिर से जोड़ा जाना चाहिए।
(शोध विवेचक, चित्रकूट)

No comments:

Post a Comment

Popular Posts