महंगा होता इलाज
राजीव त्यागी
स्वास्थ्य और शिक्षा किसी भी सभ्य समाज की दो मूलभूत आवश्यकताएं हैं। दुर्भाग्य से भारत में इन दोनों क्षेत्रों में व्यवसायीकरण का प्रभाव लगातार बढ़ता गया है। निजी अस्पतालों की बढ़ती फीस, महंगे परीक्षण, अनावश्यक जांचें, चिकित्सा उपकरणों का भारी खर्च और अब दवाइयों की बढ़ती कीमतें मिलकर आम नागरिक को असहाय बना रही हैं। चिकित्सा सेवा धीरे-धीरे सेवा के बजाय उद्योग में परिवर्तित होती दिखाई दे रही है। अस्पताल स्वास्थ्य केंद्र कम और कॉरपोरेट प्रतिष्ठान अधिक प्रतीत होने लगे हैं।
रोगी अब मरीज नहीं, बल्कि ग्राहक की तरह देखा जाने लगा है। यह स्थिति केवल आर्थिक असमानता को ही नहीं बढ़ाती, बल्कि सामाजिक विभाजन को भी गहरा करती है। आज भी देश में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं मुख्यतः उन्हीं लोगों को उपलब्ध हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति मजबूत है। गरीब व्यक्ति सरकारी अस्पतालों की लंबी कतारों, सीमित संसाधनों और अपर्याप्त सुविधाओं के भरोसे है। अमीर व्यक्ति अत्याधुनिक अस्पतालों और महंगे उपचारों का लाभ उठा सकता है।
क्या यही सामाजिक न्याय है? क्या यही वह भारत है जिसकी कल्पना स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी? भारत आज विकसित राष्ट्र बनने के स्वप्न के साथ आगे बढ़ रहा है। लेकिन उपलब्धियां और आर्थिक विकास के दावों के बीच एक प्रश्न बार-बार सामने खड़ा हो जाता है-क्या ऐसा भारत वास्तव में विकसित कहलाएगा, जहां एक सामान्य नागरिक बीमारी के कारण कर्ज में डूबने को विवश हो जाए? जहां इलाज और दवाइयों की बढ़ती कीमतें जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी तय करने लगें? नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एन.पी.पी.ए.) द्वारा कुछ जीवनरक्षक दवाओं और टीकों की कीमतों में भारी वृद्धि की अनुमति देना गंभीर चिंता का विषय है। कैंसर की कुछ दवाओं, एंटी-टेटनस सीरम और बच्चों के आवश्यक टीकों की कीमतों में लगभग पचास प्रतिशत तक वृद्धि की स्वीकृति ने लाखों परिवारों के सामने नया संकट खड़ा कर दिया है।भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक स्थिति किसी से छिपी नहीं है।
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश में बड़ी संख्या में लोग आज भी अपने इलाज का खर्च अपनी जेब से वहन करते हैं। बीमारी केवल स्वास्थ्य संकट नहीं रह जाती, वह आर्थिक संकट में भी बदल जाती है। आज की स्थिति यह है कि किसी गंभीर बीमारी का इलाज पूरा परिवार आर्थिक रूप से बर्बाद कर सकता है। कैंसर, हृदय रोग, किडनी रोग या अन्य जटिल बीमारियों का उपचार लाखों रुपये की मांग करता है। ऐसे में यदि जीवनरक्षक दवाइयों की कीमतें भी लगातार बढ़ती रहें तो गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के लिए स्वास्थ्य सेवा लगभग असंभव हो जाएगी। एन.पी.पी.ए. ने दवाओं की कीमत बढ़ाने के पीछे उत्पादन लागत में वृद्धि और बाजार में संभावित कमी का तर्क दिया है।
उनका कहना है कि यदि दवा कंपनियां लागत भी नहीं निकाल पाएंगी तो वे उत्पादन बंद कर सकती हैं, जिससे मरीजों को आवश्यक दवाएं उपलब्ध नहीं होंगी। यह तर्क अपनी जगह सही हो सकता है। किसी भी उद्योग को जीवित रहने के लिए उचित लाभ आवश्यक है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या जीवनरक्षक दवाओं को सामान्य उपभोक्ता वस्तुओं की तरह देखा जा सकता है? क्या स्वास्थ्य क्षेत्र में लाभ कमाने की सीमा और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन स्थापित नहीं किया जाना चाहिए?





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