कर्म चाहे नंगा, बस बहती रहे गंगा
- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त'
गंगा नदी नहीं है भाई, हम भारतीयों के लिए एक यूनिवर्सल वॉशिंग मशीन है। डिटर्जेंट की ज़रूरत नहीं, बस एक डुबकी मारो और जनम-जनम के पाप ऐसे ग़ायब, जैसे गधे के सिर से सींग।
हम बचपन से सुनते आ रहे हैं “मन चंगा तो कठौती में गंगा।” लेकिन हमने इसका प्रैक्टिकल वर्ज़न ढूंढ निकाला है: “कर्म चाहे नंगा, बस बहती रहे गंगा।”
ऋषिकेश से लेकर बनारस के घाटों तक चले जाइए, गंगा किनारे खड़े होकर आपको लगेगा कि यहाँ मोक्ष का कोई स्टार्ट-अप चल रहा है। लोग घाट पर ऐसे आते हैं जैसे किसी बैंक की कैश-डिपॉज़िट मशीन के सामने खड़े हों। जेब से निकाला 'घोटाला नंबर 1', 'झूठ नंबर 2', 'पड़ोसी की चुगली नंबर 3' और 'धपाक!'... सब गंगा जी के खाते में। गंगा मैया भी मन ही मन सोचती होंगी, "भैया, मैं मोक्षदायिनी हूँ, तुम्हारी रीसायकल बिन नहीं कि जो कचरा समाज में नहीं खपा पाए, वो लाकर मुझमें वाश आउट कर दिया।"
"गंगा पुत्र" होने का हमारा दावा तब तक ज़ोरदार रहता है, जब तक बात नारे लगाने की हो। जैसे ही बात कचरा डस्टबिन में डालने की आती है, हम सब अचानक "सौतेले" हो जाते हैं।
हम हर साल हज़ारों करोड़ के 'नमामि गंगे' प्रोजेक्ट्स लाते हैं। फाइलें तैरती हैं, बजट बहता है, मगर गंगा का पानी? वह आज भी इस ताक में रहता है कि कोई उसमें अपनी आस्था बहाने से पहले थोड़ा सा 'कॉमन सेंस' भी बहा दे।
आजकल गंगा किनारे मोक्ष कम, 'इंस्टाग्राम रील्स' ज़्यादा मिलती हैं। घाट की आरती में लीन भक्त का ध्यान इस बात पर कम होता है कि मंत्र क्या हैं, और इस बात पर ज़्यादा कि 'सिनेमैटिक शॉट' में बैकग्राउंड ब्लर सही आ रहा है या नहीं।
एक आदमी हाथ जोड़कर गंगा जी से प्रार्थना कर रहा था: "हे माँ, मेरे सारे पाप धो देना।"
तभी पीछे से आवाज़ आई, "भैया, थोड़ा राइट होना, फ्रेम में तुम्हारी वजह से सूरज छिप रहा है!"
अगर गंगा सचमुच इंसानी ज़ुबान में बोल पाती, तो घाट पर डुबकी लगाते ही पहला श्राप नहीं, बल्कि एक सीधा सा सवाल पूछती: "शर्मा जी, पिछले हफ़्ते जो टैक्स चोरी की थी, उसका कीचड़ मुझमें धो रहे हो, या सीधे अकाउंटेंट का सिर मुंडवा कर आए हो?"
लेकिन माँ तो माँ है, चुपचाप ज़हर पीकर भी अमृत का आशीर्वाद दिए जा रही है। इस उम्मीद में कि किसी दिन, हम डूबने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें बचाने के लिए हाथ बढ़ाएंगे।




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