आजकल टूटना भी अच्छा है !
- ललिता जोशी
अरे टूटना अच्छा नहीं है। आदमी का आत्मबल, आत्मविश्वास और मनोबल टूटना अच्छा नहीं है। अपने देश में तो आदमी के दिल से लेकर हड्डी और इनकी विचारधारा से लेकर पुल, फ्लाईओवर, वाहन, फर्नीचर और न जाने क्या-क्या टूटता रहता है लेकिन इस टूटने का लाभ उठाया है फेविकोल और इस जैसे रसायन बनाने वाली कंपनियों ने। जब वस्तुएं टूटेंगी तो जोड़ना भी पड़ता है चाहे टूट कर जुडने वाली वस्तुएं पहले जैसे नहीं हो सकती । ठीक यही हाल होता है टूटकर जुड़ने वाले अंगों का। वैसे ही ईश्वर ने इंसान को बनाया वो भी नश्वर है। इसी विचारधारा से सहमत हुए कबीरदास भी कह गए :
“पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात ।
एक दिना छिप जाएगा, ज्यों तारा परभात॥ “
इंसान नश्वर और इससे जुड़ी हुई चीजें या गतिविधियां भी नश्वर हैं या फिर टूटती हैं । एक टूटता है तो उससे दया के कारण कोई जुड़ता भी है । पुल, फ्लाईओवर और सड़क टूटे तो बहुत से लोग उससे जुड़े । या यूं कहा जा सकता है कि एक का टूटना और दूसरे का फायदा होना । ये कितना सुखद है। टूटना भी कोई बेकार नहीं जाता है । चंडीगढ़ का रॉकगार्डेन भी ऐसी ही टूटी-फूटी चीजों से बना है । इस रॉकगार्डेन के सृजक श्री नेकचंद सैनी को भारत सरकार ने पद्धश्री सम्मानित किया गया था । कितना खूबसूरत बना है ये रॉकगार्डेन । आज भी पर्यटक इस गार्डेन को देखने के लिए दूर -दूर से आते हैं। टूटी -फूटी चीजों से सृजन करना कितना खूबसूरत है ।
आकाश में भी उल्कापिंड टूटते हैं । जिसे हम तारा टूटना कहते हैं । एक मान्यता भी है कि टूटते हुए तारे को देखकर अगर कोई इच्छा की जाए तो जरूर पूरी होती है । वैसे ये हमारी हिन्दी फिल्मों में ज्यादा दिखाया जाया जाता है।
आइए अब चलते हैं अपने देश में किस तरह से टूटना-बिखरना और जुड़ना चल रहा है। इस टूट के कई कारण होते हैं और आजकल अपने देश में राजनीतिक दलों की हार टूट का कारण बन रही है । पार्टी के सदस्य अपनी पार्टी से टूटे तो जुड़ गए दूसरी राजनीतिक पार्टी में जाकर । राजनीति में जब भी कोई व्यक्ति उतरता है तो वो किसी राजनीतिक दल की विचारधारा से ही प्रेरित होकर राजनीतिक दल की सदस्यता लेता है। ऐसे शुरू होता है किसी भी व्यक्ति का राजनीतिक सफर या फिर कोई निर्दलीय रहकर अपना राजनीतिक सफर शुरू करता है।
अपने देश में आजकल मौसम है बम्पर टूट की फसल का। ऐसा लग रहा है ये एक नया फल आ गया है अपने देश में। जिसकी खरीद-फरोख्त करने वाले राजनीतिक दल होते हैं । ये टूट अगर चलती है तो वो जुड़ जाती है सत्ताधारी पार्टी से। बस टूटते-टूटते जुड़ना भी एक अच्छा काम है। चलो कुछ तो सकारात्मक हुआ। लोकतान्त्रिक देश में सभी को आजादी है अपनी विचारधारा अपनाने की ।
चुनाव में बहुमत से दूर होती पार्टियां अपने ही जीते हुए सदस्यों को अपने से दूर जाते हुए देख रही हैं, वो भी मनमसोस कर। वो भी अपनी धुर विरोधी पार्टी में। वैसे ये वैचारिक मतभेद सिर्फ हार के कारण ऐसे ही बदल जाते हैं जैसे उनमें कभी कोई वैचारिक मतभेद कभी था ही नहीं। इन विजयी उम्मीदवारों का विलयन ऐसे हो जाता है जैसे की खिचड़ी में घी का होता है । जब खिचड़ी और घी एकाकार हो जाते हैं तो फिर उसके स्वाद के कहने ही क्या होते हैं। बस आजकल यही हाल है अपने यहां की सियासत का ।
एक गीत के बोल याद आ रहे हैं :
“टूटा टूटा एक परिंदा ऐसा टूटा
कि फिर जुड़ ना पाया
लूटा -लूटा, किसने उसको ऐसे लूटा
कि फिर उड़ न पाया ?”
मगर यहाँ तो दृश्य एकदम उलट हैं । यहाँ परिंदे टूट कर ऐसे जुड़ रहे हैं कि उनकी उड़ान और ऊंची होती जा रही है। पार्टियां टूटती रहें और उसके विजयी सदस्य बहुमत वाली पार्टी से जुड़ती रहेंगी । वैसे टूटना अच्छा है जुड़ने के लिए।
(मुनिरका एन्क्लेव, दिल्ली)





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