जांच एजेंसियों की बढ़ती सक्रियता



- प्रो. नंदलाल
क्या भ्रष्टाचार कभी रुक पाएगा। चारों तरफ भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार सुनाई दे रहा है।धर्म ध्वजवाहक इसी सनातन भूमि की उपज हैं। हमारी संस्कृति दुनिया की प्राचीनतम और सर्वश्रेष्ठ संस्कृतियों में से एक है। पूजा पाठ, धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ, कर्मकांड, प्रवचन, भक्ति, वैराग्य, सहिष्णुता इत्यादि हमारे जीवन शैली के अभिन्न अंग हैं। जब कोई नौकरी में आता है या चुनाव जीतता है तो वह देश सेवा की कसमें खाता है। गीता की कसम खाता है कि मैं न्याय करूंगा, किसी के साथ भेदभाव नहीं करूंगा। भारत माता की जय बोलूँगा। ये समाज सेवक अपनी कसमें क्यों भूल जाते हैं। इसी की विवेचना इस आलेख में करने का प्रयास किया जा रहा है जरा इसे गौर से समझने का प्रयास कीजिए और अनुमान लगाइए कि ये सरकारी दीमक किस तरह समाज और देश को खोखला कर रहे हैं। किस तरह ये अपनी सात पुश्तों के लिए धन अर्जित कर रहे हैं तथा सरकार को अरबों खरबो का चूना लगा रहे हैं। किसी भी कार्य के लिए कार्यालय जाओ तो बिना चढ़ावा चढ़ाए कोई काम नहीं हो सकता।
     कहां से शुरू किया जाय कहना कठिन है।सीबीआई, ईडी और अन्य एजेंसियों के लगातार छापे पड़ते हैं और सुनने में आता है कि एक पटवारी के पास करोड़ो की संपत्ति है।एक बाबू ने करोड़ों की पेंशन राशि अपने चहेतों के नाम कर दिया और उन्हें यह भी मालूम है कि क्या हो जाएगा बहुत होगा तो जेल होगी, जेल की सजा काट लेंगे पर जीवन भर नौकरी करके करोड़ों नहीं कमा सकते। बाद में जेल से छूट जाएंगे। कृष्ण बिहारी नूर ने एक शेर कहा है-
     धन के हाथों बिके हैं, सब कानून।
      अब किसी जुर्म की कोई सजा ही नहीं।।
      चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो।
      आईना झूठ बोलता ही नहीं।।
  उम्मीद थी कि पहले के सरकारों में पनपा भ्रष्टाचार  अब कम हो जाएगा और अच्छे दिन आयेंगे किंतु बारह साल बीत गए न अच्छे दिन आ रहे हैं न भ्रष्टाचार कम होने का नाम ले रहा है। जहां छापा पड़ता है भरपूर माल निकलता है। यहां तक कि विधायक, सांसद भी डरे सहमे रहते हैं कि उनके घर में इडी का छापा ने पड़ जाय और वे पाला बदलने को बेताब रहते हैं। एक अच्छी सरकार सत्ता में आई और उम्मीद थी कि देश में पनपा भ्रष्टाचार, अनैतिक कमाई कम होगी। जनता में खुशहाली आएगी। लोगों ने बढ़ चढ़कर चुनाव में हिस्सा लिया और ऐसी सरकारों को अपदस्थ कर दिया जिसके कारण महगाई भ्रष्टाचार और अनैतिकता का साम्राज्य फैल चुका था किंतु आज जिस गति से अनैतिक कमाई वाले लोग पकड़े जा रहे हैं वे कहां से आ रहे हैं। इसका तो सीधा अर्थ यही हुआ कि इस सरकार में भी लोगों के अंदर डर नहीं है और लोग गलत तरीके से अंधाधुंध पैसा कमा रहे हैं।
    इस पर त्वरित कार्यवाही की जरूरत है। एक राज्य स्तरीय अधिकारी, रेवेन्यू से जुड़े कर्मचारी, रजिस्ट्री कार्यालय के लोग, समाज कल्याण से जुड़े लोग, यातायात से जुड़े लोग, रोड टैक्स से जुड़े लोग कहां से इतने अमीर हो जाते हैं कि इनके पास अकूत संपदा इकट्ठी हो जाती है। इतना ही नहीं जिन लोगों के हाथ में प्रशासन होता है उनकी भी तनख्वाह इतनी नहीं होती कि अच्छे शहर में एक अच्छा मकान बनवा सके पर ऐसे लोगों के पास दर्जनों प्लॉट, महंगी गाड़ियां, लक्जरियस जीवन जीने के अनेक साधन आ जाते हैं।

यह भ्रष्टाचार शासन और प्रशासन में गहरे तक पैठ गया है। जितना छापा मारिये कम ही है। ठेकेदारों इंजीनियरों नर्सिंग होम चलाने वाले डाक्टरों के पास अकूत पैसा कहां से आता है। इतना ही नहीं शिक्षा के क्षेत्र में भी ऐसे दीमक प्रवेश कर चुके हैं जो शिक्षा के नाम पर अनाप सन्नाप पैसे उगाह रहे हैं। मैं कई ऐसे शिक्षा संस्थानों को जानता हूं जहां एक भी नियमित अध्यापक नहीं हैं पर उनकी सीटें फुल रहती हैं। कैसे वहां अध्ययन अध्यापन का काम होता है। अब माफिया सिर्फ जमीन के क्षेत्र में ही नहीं रह गए अपितु शिक्षा जगत में बड़े बड़े माफिया उद्भूत हो गए हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक करना और कराना इन्हीं माफियाओं के सहारे होने लगा है।यह भी भ्रष्टाचार का एक नया तरीका है।
    ईडी की छापेमारी तो परिणाम है। अंकुश तो प्रारंभिक स्तर पर लगना चाहिए जहां से इसकी शुरुआत होती है। कर्मचारियों और सेवकों के मन में यह बात बैठनी चाहिए कि इस सरकार में ऐसा करना संभव नहीं है। तब ईडी की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। ऐसी ही सरकार पारदर्शी सरकार कहलाती है। पहले लोग लूटे फिर ईडी से वसूल कराएं कुछ उल्टी बात समझ में आती है। सरकार को इस पर लगाम लगाने की जरूरत है अन्यथा लोगों के बीच यह बात जा रही है कि सरकारें तो ऐसी ही होती हैं।बिना कुछ खर्च किए काम होता ही नहीं है।जिसके लिए कर्मचारी नियुक्त हैं वह काम न करके टाल मटोल करता है जब तक कि सामने वाला उसे ऊपर से कुछ न दे दे।
    हम हवा में अपने को कुछ भी कहते रहें पर जमीनी हकीकत यही है कि हर जगह जब तक आप कुछ खर्च करने की स्थिति में नहीं हैं आपका काम महीनों नहीं होने वाला।सरकारों को इस पर नकेल कसने की जरूरत है वरना पूरा समाज गलत वातावरण का शिकार बनता जाएगा तथा एक प्रदूषित वातावरण की निर्मिति भी होगी।

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