गरिमा बनाम मनोरंजन
– मनीषा मंजरी
हँसी मनुष्य की सबसे सहज और सुंदर अभिव्यक्तियों में से एक मानी जाती है। एक शिशु की खिलखिलाहट से लेकर जीवन के सबसे कठिन क्षणों में भी चेहरे पर आ जाने वाली हल्की मुस्कान तक, हँसी हमें मनुष्य बनाती है। यह तनाव कम करती है, संबंधों को सहज बनाती है और जीवन की कठोरताओं के बीच राहत का एक क्षण प्रदान करती है। किंतु क्या हर हँसी समान रूप से निर्मल होती है? क्या हर ठहाका उत्सव का प्रतीक होता है?
हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ हँसी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रही; वह एक सामाजिक वक्तव्य बन चुकी है। कुछ सेकंड की रील, एक वायरल क्लिप, किसी स्टैंड-अप शो का छोटा-सा अंश, और लाखों लोग उस पर हँसते हैं, उसे साझा करते हैं, उसके संवाद दोहराते हैं। लेकिन कभी-कभी इस सामूहिक हँसी के बीच एक असुविधाजनक प्रश्न सिर उठाता है, क्या हमें उस हँसी की प्रकृति पर विचार नहीं करना चाहिए, जो किसी दूसरे की गरिमा की कीमत पर पैदा होती है?
कॉमेडी और व्यंग्य का इतिहास अत्यंत समृद्ध रहा है। सत्ता के दंभ को तोड़ने, सामाजिक पाखंडों को उजागर करने और स्थापित मान्यताओं पर प्रश्न उठाने का साहस हास्य ने बार-बार दिखाया है। कई बार एक व्यंग्यकार वह सच कह देता है, जिसे गंभीर भाषण भी प्रभावी ढंग से व्यक्त नहीं कर पाते। इसलिए यह कहना गलत होगा कि हास्य को सीमाओं में बाँध देना चाहिए या कलाकारों को केवल सुरक्षित विषयों तक सीमित कर देना चाहिए। लेकिन प्रश्न विषय का नहीं, दृष्टि का है।
एक हँसी वह होती है जो अन्याय पर चोट करती है। वह अहंकार का उपहास उड़ाती है, व्यवस्था की विसंगतियों को उजागर करती है और हमें स्वयं पर हँसना सिखाती है। दूसरी हँसी वह होती है जो किसी की असहायता, पहचान, शरीर, सहमति, पेशे या गरिमा को निशाना बनाकर पैदा होती है। पहली हँसी समाज को अधिक मानवीय बनाती है; दूसरी धीरे-धीरे हमारी संवेदनशीलता को क्षीण कर देती है।
डार्क कॉमेडी साहित्य और कला का एक स्थापित रूप है। उसने युद्ध, मृत्यु, राजनीतिक हिंसा और मानवीय त्रासदियों पर भी कटाक्ष किया है। प्रश्न यह नहीं है कि विषय कितना अंधकारमय है। प्रश्न यह है कि उस अंधकार में हमारी नैतिक स्थिति क्या है। हम किसके साथ खड़े हैं? पीड़ित के साथ या पीड़ा को मनोरंजन में बदल देने वालों के साथ?
जब किसी महिला की सहमति को मज़ाक में बदल दिया जाता है, जब किसी पुरुष की भावनाओं का उपहास सामान्य मान लिया जाता है, जब किसी मृत शरीर के प्रति सम्मान को हास्य का विषय बना दिया जाता है, तब हमें यह पूछना चाहिए कि आखिर हम किस बात पर हँस रहे हैं। क्या हम किसी विचार की मूर्खता पर हँस रहे हैं, या किसी मनुष्य की गरिमा के क्षरण पर?
समाज की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक यह है कि वह धीरे-धीरे असंवेदनशील होता जाता है। जो बात पहले हमें असहज करती थी, वही बार-बार सुनने के बाद सामान्य लगने लगती है। हम कहते हैं,”अरे, मज़ाक था।” हम कहते हैं, “इतना भी गंभीर मत बनो।” लेकिन इतिहास गवाह है कि बहुत-सी अमानवीय धारणाएँ पहले चुटकुलों के रूप में ही स्वीकार की गई थीं। पूर्वाग्रह अक्सर हँसी का मुखौटा पहनकर आते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर विवादास्पद मज़ाक पर प्रतिबंध लगा दिया जाए या हर कलाकार को कठघरे में खड़ा कर दिया जाए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार है। कलाकारों को प्रयोग करने, सीमाओं को परखने और प्रश्न उठाने का अधिकार है। लेकिन दर्शकों को भी उतना ही अधिकार है कि वे कह सकें, “यह हमें स्वीकार नहीं है।”
उत्तरदायित्व और स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। वे एक-दूसरे के पूरक हैं। किसी मंच पर कही गई बात केवल मंच तक सीमित नहीं रहती। वह विचार बनती है, विचार व्यवहार बनता है और व्यवहार सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बन जाता है। इसलिए सार्वजनिक आलोचना का उद्देश्य केवल दंड नहीं होना चाहिए; उसका उद्देश्य संवाद, आत्ममंथन और सुधार भी होना चाहिए।
शायद हमें अपने बच्चों को यह सिखाने की आवश्यकता है कि बुद्धिमत्ता और क्रूरता एक ही चीज़ नहीं हैं। किसी का अपमान कर देना हास्य नहीं है। किसी की गरिमा की कीमत पर लोकप्रिय हो जाना प्रतिभा नहीं है। सबसे कठिन और सबसे सुंदर हास्य वही है जो बिना किसी को छोटा किए भी गहरी बात कह सके।
आज जब हम किसी वायरल क्लिप पर हँसते हैं, किसी मंचीय प्रस्तुति पर तालियाँ बजाते हैं या किसी चुटकुले को आगे बढ़ाते हैं, तब हमें स्वयं से एक प्रश्न अवश्य पूछना चाहिए, क्या यह हँसी किसी मनुष्य की गरिमा को कम कर रही है? क्योंकि किसी समाज का चरित्र केवल उसके कानूनों से निर्धारित नहीं होता, उसकी हँसी से भी पहचाना जाता है। और शायद हमारे समय का सबसे आवश्यक प्रश्न यही है, क्या हमें उस हँसी की प्रकृति पर विचार नहीं करना चाहिए, जो किसी दूसरे की गरिमा की कीमत पर पैदा होती है? यदि इस प्रश्न का उत्तर “हाँ” है, तो संभव है कि हम केवल बेहतर दर्शक ही नहीं, बल्कि बेहतर मनुष्य भी बन सकें।
(उपन्यासकार और कवयित्री, दरभंगा)






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