सरकारी स्कूलों की उपेक्षा
राजीव त्यागी
स्कूली शिक्षा प्रणाली के संदर्भ में ‘नीति’ आयोग ने एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है। यह विडंबना ही है कि ‘नीट’ की परीक्षा में हुई धांधली की धूल में नीति-आयोग की यह रिपोर्ट कहीं खो सी गयी है। इस रिपोर्ट के कुछ आंकड़े सिर्फ चौंकाते ही नहीं, परेशान भी करते हैं।
जैसे, यह रिपोर्ट बताती है कि देश में सरकारी और निजी स्कूलों की स्थितियों का अंतर शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र की उपेक्षा को ही उजागर नहीं करता, बल्कि यह भी बता रहा है कि देश के भविष्य को लेकर हमारी चिंताएं कितनी खोखली हैं। नीति-आयोग की यह रिपोर्ट शिक्षा क्षेत्र की बुनियादी कमजोरियों को उजागर कर रही है। पिछले एक दशक के विश्लेषण पर आधारित यह रिपोर्ट बता रही है कि हमने शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र को सरकारी और गैर-सरकारी में बांटकर समूची शिक्षा प्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिये हैं।
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार देश के एक लाख 19 हजार सरकारी स्कूलों में बिजली नहीं है; 98,592 स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय नहीं है; चौदह हजार से अधिक स्कूलों में पीने का पानी नहीं है; एक लाख से अधिक स्कूलों में सिर्फ एक अध्यापक एक से अधिक कक्षाओं को पढ़ा रहा है। रिपोर्ट में ऐसे और भी कई आंकड़े हैं जो यह बताते हैं कि शिक्षा जैसे बुनियादी क्षेत्र में हम किस तरह की आपराधिक उपेक्षा बरत रहे हैं। हम देश के हर बच्चे के शिक्षा के अधिकार की बात तो करते हैं, पर किस प्रकार की शिक्षा दी जा रही है इस बारे में शायद सोचना ही नहीं चाह रहे।
सन् 2021-22 में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में 10,22,386 सरकारी और 3,35,844 निजी स्कूल हैं। यहां निजी स्कूल का मतलब महंगी पढ़ाई और बेहतर सुविधा है। यह कतई ज़रूरी नहीं है कि महंगी पढ़ाई का मतलब अच्छी पढ़ाई ही हो। ‘पढ़ेगा इंडिया बढ़ेगा इंडिया’ का नारा देने वाले को इस बात की भी चिंता होनी चाहिए कि ‘इंडिया’ क्या पढ़ रहा है? कैसी पढ़ाई कर रहा है। दुर्भाग्य से यह चिंता कहीं दिखाई नहीं देती।





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