कमजोर अर्थव्यवस्था

 
कवलजीत सिंह 

भाजपा सरकार ने देश के सामने नए भारत का सपना रखा था। दावा किया था कि आर्थिक सुधारों की तेज़ रफ्तार भारत को विश्व की महाशक्ति बना देगी। मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया, जीएसटी और नोटबंदी जैसे कदमों को ऐतिहासिक आर्थिक क्रांति बताया गया। कॉरपोरेट सेक्टर को खुलकर समर्थन दिया गया, बड़े उद्योगपतियों को निवेश और विस्तार के लिए अभूतपूर्व अवसर दिए गए। लेकिन एक दशक बाद तस्वीर उतनी चमकदार दिखाई नहीं देती, जितनी प्रचारित की गई थी। आज देश की अर्थव्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। 

कभी विकास दर के आंकड़ों से दुनिया को प्रभावित करने वाला भारत अब बेरोजगारी, महंगाई, घटती क्रयशक्ति और गिरते रुपये जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। यह सही है कि वैश्विक परिस्थितियों-जैसे कोरोना महामारी, रूस-यूक्रेन, ईरान-अमेरिका और इजरायल युद्ध और अंतरराष्ट्रीय मंदी-का असर भारत पर भी पड़ा, लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि कई घरेलू आर्थिक फैसलों ने हालात को और बिगाड़ा। नोटबंदी को काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक कहा गया था। लेकिन वर्षों बाद भी यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि उससे देश को वास्तविक आर्थिक लाभकितना मिला। 

छोटे व्यापार, असंगठित क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को जो झटका लगा, वह आज तक पूरी तरह उबर नहीं पाया। लाखों छोटे उद्योग बंद हुए, रोजगार के अवसर कम हुए और नकदी आधारित अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा। इसी तरह जीएसटी को वन नेशन, वन टैक्स का नाम देकर लागू किया गया, लेकिन इसकी जटिल संरचना ने छोटे और मध्यम व्यापारियों की कमर तोड़ दी। आज हालात यह हैं कि देश का युवा रोजगार के लिए भटक रहा है। कृषि क्षेत्र संकट में है। मध्यम वर्ग टैक्स और महंगाई के दोहरे बोझ तले दबा हुआ है। रुपया लगातार कमजोर हो रहा है और आम आदमी की बचत धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। सरकार लगातार दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का सपना दिखा रही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल बड़े आंकड़े ही विकास का प्रमाण हैं। यदि आम नागरिक की आय नहीं बढ़ रही, रोजगार नहीं बन रहे और जीवन स्तर गिर रहा है, तो आर्थिक विकास का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है।

 यह भी सच है कि किसी भी लोकतंत्र में केवल व्यक्तित्व आधारित राजनीति लंबे समय तक समाधान नहीं दे सकती। अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए संस्थागत मजबूती, पारदर्शिता, स्वतंत्र आर्थिक सोच और दीर्घकालिक नीति की आवश्यकता होती है। अब देश के सामने सबसे बड़ा प्रश्न नेतृत्व परिवर्तन का नहीं, बल्कि नेतृत्व की कार्यशैली के परिवर्तन का है। केवल चेहरा बदल देने से अर्थव्यवस्था नहीं बदलती। 

नीतियों की दिशा बदलनी पड़ती है। अब जरूरत इस बात की है कि आंकड़ों की चमक से आगे बढ़कर जमीन की सच्चाई को समझा जाए और छोटे उद्योगों को पुनर्जीवित कर कृषि और रोजगार को प्राथमिकता दी जाए। इस समय ईमानदार आर्थिक आत्ममंथन और साहसी सुधारों की आवश्यकता है।

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