गुरु पर भारी पड़ते चेले
- ललिता जोशी
भारतीय संस्कृति में गुरु शिष्य परंपरा का महत्व बहुत ज्यादा था । गुरु शिष्य परंपरा में गुरु के साथ शिष्य उनके निवास पर रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे । गुरु पत्नी जो कुछ बना कर देती उसे ये शिष्य उसे भोजन नहीं प्रसाद समझ कर ग्रहण करते थे । इन गुरुओं के घर या गुरुकुल में राजा हो रंक सभी एक साथ शिक्षा ग्रहण करते थे । भारतीय संस्कृति में सबसे पवित्र और निस्वार्थ संबंधों में से एक है ।इस परपरा को श्रद्धा,ज्ञान और समर्पण से समझा जा सकता है। गुरु अंधकार को हटाने वाला होता है और शिष्य साधक है जिसके जीवन में गुरु ज्ञान का प्रकाश भर देता है । कबीरदास जी ने भी कहा-
गुरु गोविंद दोऊ खड़े ,काके लांगू पाय ।
बलिहारी गुरु आफ्नो ,गोविंद दियो बताय ॥
अर्थात गुरु और गोविंद यानि ईश्वर दोनों साथ खड़े हों ,तो पहले गुरु के चरण स्पर्श करने चाहिए । ऐसा इसलिए क्योंकि गुरु ने ही भगवान तक पाहुचने का मार्ग (ज्ञान) दिखाया है ,इसलिए गुरु का स्थान भगवान से भी ऊंचा है । गुरु का स्थान ईश्वर के समान पूजनीय है । गुरु और शिष्य की परंपरा में शिष्य का समपर्ण है और गुरु का श्रम ।
कालांतर में ये शिष्य चेले में परिवर्तित हो गए और गुरु अभी गुरु ही बने रहे लेकिन गुरु अब विद्यालय में नौकरी करने लगे हैं और शिक्षक कहलाने लगे । ये शिक्षक बच्चों को स्कूल में पढ़ाते हैं इसके एवज में वेतन पाते हैं जबकि प्राचीन गुरु शिष्य परंपरा में गुरु अपने शिष्य से विद्या पूर्ण होने पर जब वो गुरुकुल छोड़कर अपने घरों को प्रस्थान करते थे तो गुरु अपनी इच्छानुसार गुरुदक्षिणा मांगते थे या फिर शिष्य खुद अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा देते थे । अब ज्ञान बिकता है स्कूलों में ,कॉलेजों में,कोचिंग सेंटरों में । शिक्षा अब व्यापार है । स्कूल से किताब ,यूनिफ़ोर्म आदि सब खरीदो तो ठीक है अगर न खरीदो तो प्रिंसिपल की धौंस और वाहियात बात सुनो । समय के साथ बहुत कुछ बदल रहा है । पहले छात्र गुरुओं से पीटते थे अनुशासन ,शिक्षा और चरित्र के लिए । अब तो टीचर बच्चों को समझा सकते हैं लेकिन उन्हें पीटना तो दूर हाथ तक नहीं लगा सकते । कभी -कभी गुरु शिक्षा के नाम पर छात्रों को इतना पीटते हैं कि छात्र को शारीरिक नुकसान के साथ मानसिक प्रताड़ना भी होती है । इसीलिए शिक्षा सुधारों में इस बात पर बल दिया गया कि बच्चों के साथ ज़ोर जबर्दस्ती नहीं की जाएगी । अब न तो वो गुरु शिष्य परंपरा ही रह गई है । छात्रों का अपने अध्यापकों के साथ सर्विस प्रोवाइडर और कस्टमर वाली हो गई है । ये लाभ कमाने वाली संस्थाएं बन चुकी हैं । अब ये गुरु शिष्य परंपरा तो शायद धुंधली होती जा रही है ।ये शिष्य अब चेले में परवर्तित हो गए हैं। संगीत, कला के जगत में अब कुछ ही गुरु बचे होंगे।
राजनीति में आज गुरु और चेले हैं । जो अपने गुरु को दक्षिणा में जो देते हैं उसे सम्पूर्ण देश देखते ही रह जाता है । चेला अपने गुरु की पार्टी छोड़ दूसरे दल में चले जाते हैं । गुरु को अपने चेले की कारस्तानी का तब पता चलता है जब वो नेशनल मीडिया के समक्ष आ कर पार्टी छोड़ने की घोषणा करता है । अवसरवादी चेले गुरु की नाक के नीचे बगावत का झण्डा लेकर दूसरी पार्टी में घुस जाते हैं या फिर अपनी पार्टी अलग से बना लेते हैं । सफाई में बोला जाता है कि वहाँ दम घुटता है और वहाँ पर हमें अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है । ऐसे ही अन्ना जी के आंदोलन में सभी शामिल हुए और फिर मौका देखकर अपनी राजनीतिक पार्टी बना डाली और अन्न जी पर झाड़ू फेर दिया । आज अन्ना जी अपने गाँव में शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे हैं । वैसे राजनीति में कब कौन किसको रद्दी की टोकरी में डाल दे कुछ कहा नहीं जा सकता । भाई -भाई को कुर्सी के लिए छोड़ कर अपनी पार्टी बना लेते हैं। भतीजा अपने चाचा को छोड़कर निकल लिए ।
अभी हालिया घटना में एक नेता ने झाड़ू को छोड़ हाथ में कमल ले लिया । अब उनकी पूर्व पार्टी के नेता ये कह रहे हैं कि हमने इन्हें राजनीतिक मंच दिया । इन्हें हमने चलना सिखाया आज ये खुद तो निकले साथ में ओरों को भी लेकर चल पड़े । राजनीति में चेले अपने गुरु को गुरु घन्टाल बताते हैं और खुद को मासूम बताते हैं । जैसे गुरु को चेले की खूबियाँ और खामियां पता होती हैं ठीक वैसे ही चेले को भी अपने गुरु की खूबियाँ और खामियां मालूम होती हैं । जब गुरु और चेले में अपने निजी स्वार्थों का घर्षण होता है तो जो ज्यादा कद्दावर होता है वो साम दाम दंड भेद की नीति अपनाते हुए अपना रास्ता बना कर आगे निकल जाते हैं । प्रेम और युद्ध में सब जायज होता है । अपने राघव जी ने भी झाड़ू बुहारी की और फिर लक्ष्मी को प्रिय पुष्प कमल को हाथ में ले लिया । इस कमल ने भी सत्ता के इन बागियों को गले लगा कर अपने में आत्मसात कर लिया । आजकल राजनीतिक चेले अपने गुरुओं को ठेंगा दिखाकर आगे निकल कर अपना भविष्य बना रहे हैं । चेले गुरुओं पर भारी पड़
रहे हैं ।
(मुनिरका एन्क्लेव, दिल्ली)






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