मुफ्त की रेवड़ी और युवा
इलमा अज़ीम
चुनाव के दौरान तकरीबन सभी राजनीतिक दलों की ओर से वोटर्स के लिए तरह-तरह की ऐसी मुफ्त की योजनाएं लाई जाती हैं, जिनसे सरकारी खजाना खाली होता जाता है। राज्य सरकारों से लेकर केंद्र सरकार तक मुफ्त की रेवडि़यां बांटने से परहेज नहीं करतीं। चिताजनक यह है कि इन मुफ्त की रेवड़ियों से आज की युवा पीढ़ी भी प्रभावित है।
एक तरह से ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही है जिसके मुंह मुफ्त की रेवड़ियों का स्वाद लग चुका है। फिर यदि एक बार आप किसी को मुफ्त की सुविधा का स्वाद चखा दें, तो फिर उसे आसानी से वापस नहीं लिया जा सकता। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि बहुत सारी राज्य सरकारों के खजाने खाली हैं। उन पर लाखों करोड़ का कर्ज है, कर्मचारियों को वेतन देने के पैसे नहीं हैं। पिछले साल बिहार के चुनाव से पहले अड़तीस हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए थे।
हालत यह हो गई थी कि वहां की सरकार के पास जरूरी खर्चों के लिए भी पैसे नहीं बचे थे। एक अनुमान के अनुसार विभिन्न सरकारों द्वारा महिलाओं के लिए जो मुफ्त की योजनाएं चलाई जा रही हैं, उनकी राशि एक लाख, अड़सठ हजार, चालीस करोड़ तक पहुंच सकती है। किसी जमाने में ‘अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए सबके दाता राम’ को उन लोगों को निंदा के रूप में सुनाया जाता था, जो कुछ नहीं करना चाहते थे, लेकिन अब तो लगता है कि सरकारें ही इसके लिए प्रोत्साहित कर रही हैं।
हालांकि उच्चतम न्यायालय बार-बार इस बारे में अपनी अप्रसन्नता प्रकट कर चुका है, मगर ‘स्वारथ-लागि करें सब प्रीती’ के इस दौर में न नेता सुनते हैं, न जनता। नेताओं का स्वार्थ वोट और जनता का स्वार्थ मुफ्त में सब कुछ। अपने देश में बताया जाता है कि अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त में वर्षों से राशन मुफ्त दिया जा रहा है। इसका नतीजा यह है कि अब गांवों में भी लोग काम नहीं करना चाहते।
चूंकि तरह-तरह की सरकारी योजनाओं से लोगों को बिना कुछ किए पैसे भी मिल रहे हैं और खाने-पीने की सुविधाएं, तो अब युवा काम नहीं करना चाहते। वे दिनभर मटरगश्ती करते हैं। चूंकि काम नहीं तो खाली दिमाग शैतान का घर, इसलिए लड़ाई-झगड़ा, हत्या यानी कि अपराधों का ग्राफ भी बढ़ रहा है। गांव में अब मजदूर तक नहीं मिलते। यह स्थिति आने वाले समय में देश पर ही भारी पड़ सकती है। युवाओं को तमाम लाभ देने के बजाए उनको कर्मशील बनाया जाए।





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