हिंदू धर्म कर्मकांड नहीं जीवन शैली

   - प्रो नंदलाल
   सुप्रीम कोर्ट ने अपने अहम फैसले में कहा है कि हिंदू धर्म कर्मकांड नहीं अपितु यह एक जीवन शैली है।"यह बात बिल्कुल सत्य और तर्कपूर्ण है।हिंदू धर्म विश्व का प्राचीनतम धर्म है और हमारे वेद जो अपौरुषेय हैं वे जीवन मार्ग हैं जो व्यक्ति को समष्टि से जोड़ते हैं। यों तो देखा जाय तो सभी मुख्य धर्म एक अलौकिक सत्ता को अपना ईश्वर, गॉड,भगवान मानते हैं और उसी को अपना परम पिता भी मानते हैं जो हमे जन्म देकर इस जगत में भेजता है और जब तक चाहता है इस लोक में रखता है और फिर यहां से बुला भी लेता है।अर्थात जीवन चक्र के क्रम को बनाए रखना तथा सृष्टि के संचालन की निर्बाध व्यवस्था वही परमपिता ही करता है,ऐसा हिंदू धर्म का मत है।परमात्मा ने नाना प्रकार के योनियों को बनाया है तथा उसका लालन पालन भी कर रहा है।हिंदू धर्म में माना गया है कि सृष्टि का संचालन ब्रह्मा,विष्णु,और महेश इन तीन शक्तियों के माध्यम से हो रहा है जहां ब्रह्मा जी को सृष्टि निर्माण यानि सृजन का कार्य सौंपा गया है।विष्णु जी के माध्यम से लोगों की परवरिश,लालन पालन का कार्य संचालित हो रहा है।भगवान शंकर को संहार यानि समाप्ति का कार्य सौंपा गया।इसलिए हमारे ये तीन भगवान सृजन,पालन,और संहार के कार्य में हमेशा लगे रहते हैं।
       तुलसीदास जी ने लिखा है 
    धरा को प्रमाण यहे तुलसी
    जो फ़रा सो झरा 
     जो बरा सो बुताना।
     जो कुछ चर अचर इस दुनिया में है उसका नियंत्रण उसके हाथ में नहीं है।उसके हाथ में उसके कर्म हैं और कर्म भी दो प्रकार के हैं,एक तो अपने जीने के लिए और दूसरा भगवद्भक्ति के लिए।इन्हीं कर्मों में दुनिया के भौतिक और आध्यात्मिक सभी कर्म आ जाते हैं।यहीं पर कर्मकांड घुस आया है जिसने व्यक्ति को सोचने और तर्क करने पर मजबूर किया है।बहुत से ऐसे संप्रदाय भी हैं जो ईश्वर की सत्ता को मानते भी नहीं है।जो नहीं मानते हैं वे कर्मकांड को भी नहीं मानते और जो ईश्वरीय सत्ता की अनुभूति करते हैं वे कर्मकांड और उससे भी आगे के कांडों को भी अपनाते हैं।जैसे अपने कार्य सिद्धि के लिए बलि चढ़ा देना।और यह मानना की शक्तियां इससे प्रसन्न होती हैं और उनकी प्रसन्नता से सारे कार्य सफल होते हैं।यह एक दूषित सोच है और इससे कोई सफलता हासिल नहीं होती।

     विश्व के तमाम धर्मों में हिंदू धर्म एक ऐसा धर्म है जो मानव को इंसान बनाने का मार्ग और दिशा देता है।सर्वे भवन्तु सुखिनाः,सर्वे संतु निरामया,सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद दुख भाग भवेत्।किस धर्म में विश्व के कल्याण की कामना की गई है।हिंदू धर्म के ग्रन्थ,वेद, पुराण,उपनिषद,श्रुति,स्मृति,रामायण,गीता ऐसे ग्रन्थ हैं जो इंसानों के भलाई की बात बताते है।इसलिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय को यह बात कहनी पड़ी कि हिंदू धर्म जीवन शैली है।आप किस तरह की जीवन पद्धति अपनाना चाहते है यह आपके ऊपर है।हिंदू धर्म में कहीं भी जोर जबरदस्ती की बात नहीं है।कुछ लोग अपने द्वारा नित्य प्रति  किए गए गलत कार्यों के दंड से बचने के लिए कोई बायपास उपाय खोजते हैं और दुनिया में बहुत से ऐसे लोग हैं जिनके पास उन कुकर्मों के दंड से बचने की दवा यानि कर्मकांड की दवा रहती है और वे धडल्ले से कहते पाए जाते हैं कि तुम जितना चाहो अपराध करो उसकी दवा मेरे पास है।

      आप सभी देखते होंगे कि बड़े बड़े सेठ महाजन, व्यापारी और व्यवसायिक लोग ठंड के सीजन में कंबल बांटते हैं।लंगर चलाते हैं,कपड़े दान करते हैं,भोजन कराते है, भंडारा खिलाते हैं।उनसे कौन कहता है कि आप ऐसा करिए।वे ऐसा इसलिए करते हैं कि अपने व्यवसाय में जो वन टू का फोर,फोर टू का वन  करते हैं उस पाप को कम करने के लिए ऐसा कार्य करते हैं।विज्ञान जैसे जैसे प्रगति कर रहा है धर्म भी अपना रूप पकड़ने लगता है।विज्ञान और धर्म में बड़ी प्रतिस्पर्धा होती है।विज्ञान से हम अपने लिए कृत्रिम उपकरणों का निर्माण करते हैं और अपनी जरूरतों के हिसाब से उसका उपयोग करते हैं जबकि यह प्रकृति विरुद्ध होता है।विज्ञान चमत्कारी होता है और प्रकृति को मुंह चिढ़ाता है पर प्रकृति कहां मानने वाली।अपने विरुद्ध किए जा रहे षड्यंत्रों को वह तुरंत पकड़ लेती है और अपना हिसाब किताब पूरा कर लेती है।धर्म प्रकृति की भी रक्षा करता है और पुरुष की पूजा करता है।धर्म में घुस आई विकृतियां ही समस्या का कारण बनती हैं।प्रकृति और पुरुष का सहअस्तित्व ही सृष्टि है।
    मनुष्य को जीवन कैसे जीना है,कैसे वह प्रसन्न रहे, कैसे सभी प्राणियों के कल्याणार्थ कार्य करे, जीवों का अस्तित्व कैसे बना रहे।बड़े छोटे का आचरण कैसा हो।परस्परपूरकता और सह अस्तित्व का ऐसा भाव बने की मनुष्य आनंदित रहे,स्वस्थ रहे,एक दूसरे के काम आए यही धर्म है।जीव मात्र की भलाई के लिए किया जाने वाला कार्य धर्म है।कर्मकांड ,ज्योतिष,हस्त रेखा,इत्यादि यह मनुष्य को संस्कारित करने वाले कर्म हैं।जो संस्कारवान बनना चाहे,जो भविष्य के प्रति सचेत रहना चाहे ,जो अपने मनोविज्ञान को ठीक रखना चाहे वह कर्मकांड को अपना सकता है।कर्मकांड, संस्कारों को निभाने का एक उपकरण है पर वह धर्म को संपादित करने के लिए अनिवार्य नहीं है।
(शोध विवेचक चित्रकूट)

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