गंभीर जल और पर्यावरणीय संकट की आहट


- जयसिंह रावत
हिम के घर के रूप में प्रतिष्ठित हिमालय में बर्फ की कमी गंभीर चिंता का विषय है। अध्ययनों के अनुसार हिमालय में हिमपात और बर्फ के जमाव की दर में कमी आ रही है, जिससे हैंगिंग ग्लेशियरों और हिमनदी झीलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसके कारण केदारनाथ और ऋषिगंगा जैसी भयंकर आपदाओं की आशंका बढ़ रही है। साथ ही सतलुज-झेलम से लेकर ब्रह्मपुत्र तक हिमनदों पर निर्भर नदियों में जलप्रवाह में कमी की आशंका भी बढ़ गई है। इससे पूरे एशिया के मौसम में बदलाव की आशंकाएं बढ़ रही हैं।

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) की हालिया प्रकाशित वैज्ञानिक रिपोर्ट के आधार पर उत्तराखण्ड के अलकनन्दा बेसिन में बढ़ती हैंगिंग ग्लेशियरों की समस्या का स्वतः संज्ञान लिया। उक्त शोधपत्र के अनुसार उत्तराखंड के अलकनन्दा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान की गई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि और वर्षा के स्वरूप में बदलाव से इन ग्लेशियरों की स्थिरता तेजी से कम हो रही है। फलतः पर्वतीय ढलानों पर अचानक बर्फ या बर्फ-मिश्रित चट्टानों के गिरने की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे विनाशकारी हिमस्खलन और बाढ़ जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं।
काठमाण्डू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट की ताजा रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2026 में हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र में बर्फ के जमीन पर टिके रहने की अवधि सामान्य से 27.8 प्रतिशत कम दर्ज की गई है। यह पिछले दो दशकों में सबसे न्यूनतम स्तर है और लगातार चौथा वर्ष है जब हिम स्तर सामान्य से नीचे रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लेशियल लेक्स की संख्या में वृद्धि के साथ नदियों के प्रवाह में भारी कमी आ सकती है।

वर्ष 2019 में प्रकाशित इंटरनेशनल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की रिपोर्ट में कहा गया था कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित नहीं किया गया, तो इस सदी के अंत तक हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र के एक-तिहाई से अधिक ग्लेशियर समाप्त हो सकते हैं। इसी प्रकार, वर्ष 2021 में प्रकाशित ‘विश्व मौसम संगठन’ की रिपोर्ट में हिमालयी क्षेत्रों में औसत तापमान वृद्धि को वैश्विक औसत से अधिक बताया गया, जो ग्लेशियरों के तेज पिघलाव का प्रमुख कारण है।

हिमालय में बढ़ते खतरों के चलते वर्ष 2021 की 7 फरवरी को चमोली जिले में ऋषिगंगा-धौलीगंगा आपदा हुई थी। इस घटना में अचानक आई बाढ़ ने भारी तबाही मचाई थी। वैज्ञानिकों के अनुसार यह आपदा संभवतः एक चट्टान और ग्लेशियर के संयुक्त टूटने से उत्पन्न हुई थी। इसी तरह, वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा में अत्यधिक वर्षा, ग्लेशियर झील के फटने और भूस्खलन के संयुक्त प्रभाव से हजारों लोगों की जान चली गई थी।

दरअसल, हिमालयी क्षेत्रों में मानव गतिविधियों का बढ़ता दबाव संकट को और जटिल बना रहा है। पिछले दो दशकों में तीर्थस्थलों, पर्यटन केंद्रों और सीमा क्षेत्रों में सड़कों, भवनों तथा अन्य बुनियादी ढांचे का तेजी से विस्तार हुआ है। वैज्ञानिकों ने पाया कि कई सीमांत क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियां ऐसे स्थानों तक पहुंच गई हैं, जो भूस्खलन और हिमस्खलन के दृष्टि से अत्यधिक जोखिम वाले हैं। जब प्राकृतिक अस्थिरता और मानव दबाव एक साथ बढ़ते हैं, तो आपदाओं की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।

अध्ययनों में पाया गया कि गंगा बेसिन के कई ग्लेशियर पिछले तीन दशकों में औसतन 10–30 मीटर प्रति वर्ष की दर से पीछे हट रहे हैं। इसके साथ ही ग्लेशियर झीलों की संख्या और आकार में भी वृद्धि हुई है। इन झीलों के अचानक फटने की घटनाएं विनाश का कारण बन सकती हैं।

उत्तराखंड में 2013 के बाद से कई नई झीलों की पहचान की गई है, जिनमें से कई को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। हिमालयी बर्फ और ग्लेशियर पिघलाव से हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र की नदियों के कुल प्रवाह का लगभग 23 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त होता है। यदि बर्फ की मात्रा लगातार घटती रही, तो प्रारंभिक वर्षों में बाढ़ की घटनाएं बढ़ सकती हैं, लेकिन दीर्घकाल में नदियों का जल स्तर घट सकता है, जिससे कृषि, जलविद्युत उत्पादन और पेयजल आपूर्ति पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। हिमालय में घटती बर्फ मानव अस्तित्व से जुड़ा गंभीर प्रश्न बनती जा रही है। इससे आने वाले वर्षों में हिमालयी क्षेत्र से जुड़े विशाल भूभाग को भी गंभीर जल-पर्यावरणीय संकट का सामना करना पड़ सकता है।

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