बढ़ रहा कार्बन संकट
राजीव त्यागी
दुनिया इस समय दोहरी मार झेल रही है। एक तरफ घरों की भारी कमी। दूसरी तरफ महंगी होती बिजली और ईंधन। ऐसे समय में एक नई वैश्विक रिपोर्ट ने साफ कहा है कि अगर इमारतों और घरों को जलवायु के हिसाब से नहीं बदला गया, तो आने वाले सालों में रहने की लागत और बढ़ेगी, ऊर्जा संकट गहराएगा और शहर ज्यादा असुरक्षित हो जाएंगे।
लेकिन रिपोर्ट में एक दिलचस्प बदलाव भी दिखा। निर्माण गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं, मगर उनके मुकाबले कार्बन उत्सर्जन की रफ्तार थोड़ी धीमी हुई है। यानी दुनिया पहले जितना प्रदूषण फैलाए बिना ज्यादा निर्माण करने लगी है, हालांकि यह बदलाव अभी बहुत सीमित है।
रिपोर्ट के अनुसार 2024 में वैश्विक भवन क्षेत्र का कुल फ्लोर एरिया 273 अरब वर्ग मीटर तक पहुंच गया। इसका बड़ा हिस्सा भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे उभरते देशों में निर्माण की वजह से बढ़ा। आज भवन और निर्माण क्षेत्र दुनिया की लगभग 50 प्रतिशत सामग्री खपत, 28 प्रतिशत ऊर्जा खपत और 37 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है।
2020 के बाद निर्माण की रफ्तार इतनी तेज हुई कि हरित बदलाव पीछे छूटने लगा।
यह रिपोर्ट एक चेतावनी भी है कि अगर अभी बने घर और इमारतें पारंपरिक सीमेंट, खराब डिजाइन और ऊर्जा-अक्षम तकनीकों पर आधारित रहीं, तो वे दशकों तक कार्बन उत्सर्जन “लॉक-इन” कर देंगी। यानी आने वाली पीढ़ियां उन इमारतों की वजह से लगातार ज्यादा ऊर्जा खर्च और ज्यादा उत्सर्जन झेलेंगी।





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