पेयजल की शुद्धता

 राजीव त्यागी 

भारत दुनिया की लगभग 18 प्रतिशत आबादी का घर है, लेकिन हमारे पास वैश्विक मीठे पानी के संसाधनों का केवल 4 प्रतिशत हिस्सा उपलब्ध है। यह असंतुलन ही देश में जल संकट की बुनियादी जड़ है।

 सवाल यह है कि क्या हम अपने नागरिकों को एक गिलास शुद्ध पानी देने में सक्षम हैं? जल जीवन मिशन और ‘अमृत’ जैसे प्रोजेक्ट्स के पिछले सात वर्षों के सफर को देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि व्यवस्था ने केवल पाइप बिछाने की गति को ही सफलता मान लिया, जबकि पानी की शुद्धता और उसकी निरंतरता को हाशिए पर धकेल दिया गया। हजारों गांवों में पाइप और नल तो लगे हैं, लेकिन पानी का दबाव इतना कम है कि वह अंतिम घर तक नहीं पहुंचता। कई स्थानों पर तो नल केवल ‘शोपीस’ बनकर रह गए हैं। फिर नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पहाड़ी क्षेत्रों के 60 प्रतिशत जल स्रोत सूख चुके हैं। मैदानी इलाकों में भूजल का स्तर इतनी तेजी से गिर रहा है कि नलों के लिए पानी का कोई स्थायी स्रोत ही नहीं बचा है। 

गांवों से पलायन और शहरों का अनियोजित विकास, सरकार द्वारा तैयार मूलभूत संरचना पर आवश्यकता से अधिक बोझ ने महानगरों को पानी के लिए कंगाल बना दिया है। दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे महानगरों में पाइपलाइन लीकेज और सीवेज मिक्सिंग एक आम समस्या बन गई है। शहरी भारत में अभी भी बड़ी मात्रा में पानी ‘नॉन-रेवेन्यू वॉटर’ के रूप में बर्बाद हो जाता है, जो मुख्य रूप से पाइपलाइनों के रिसाव के कारण होता है। सबसे बड़ी विफलता जल वितरण और सीवेज प्रबंधन के बीच समन्वय का अभाव है। शुद्ध पेयजल की निरंतरता और उपलब्धि बनाए रखने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है। 


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